जनता पर शासक के अधिकार



समाज और समुदाय का वातावरण उसी समय मेल मिलाप से रहेगा, शांतिपूर्ण होगा, अमन और सुकून से रहेगा जब समाज के जीवन व्यवस्था का जिम्मेदार एक न्यायिक व्यक्ति हो, अल्लाह से भय खाने वाला व्यक्ति हो, अपने प्रत्येक कर्म पर अल्लाह को निगरां समझता हो, समाज की जिम्मेदारी को सेवा समझता हो और केवल अपने पेट भरने का माध्यम न समझता हो, तब ही वह अच्छे तरीके से समाज की सेवा कर सकेगा, इसी लिए तो अल्लाह तआला ने इस्लाम धर्म के प्रचार और स्पष्टीकरण के लिए प्रत्येक काल और समाज में उसी समुदाय में से एक सब से उत्तम व्यक्ति को नबी और रसूल नियुक्त करता था और सब से अन्तिम में मुहम्मद को सारे युग और संसार के लिए अन्तिम संदेष्ठा के रूप में अरब देश में भेजा और इस्लाम धर्म के प्रचार और उसकी शिक्षा देने का जिम्मेदारी दी जिसे मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बहुत सुन्दर और उत्तम तरीके से अदा कर दिया और अल्लाह के एक एक आदेश तथा आज्ञा को लोगों तक पहुंचा दिया, जिस में दुनिया और आखिरत (पारलोक) के प्रत्येक चीज़ो के बारे में स्पष्ट कर दिया गया है। जो व्यक्ति इस दुनिया में जैसा कर्म पेश करेगा, उसका वैसा फल आखिरत में पाएगा, इस्लाम धर्म जो प्रत्येक रुप से पूर्ण है और जीवन के प्रत्येक दिशा में सही मार्ग दर्शन करता है, समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए कुछ जिम्मेदारी नियुक्त की, उस को सही से अदा करने पर पूण्य का वादा किया है और जो अपने जिम्मेदारी को सही तरीके से अदा नहीं करेगा, उस पर उसे पाप और पारलौकिक जीवन में यातनाएं के प्रति चेतावनी दे दिया गया है।
इस लिए इस्लाम के आदेशों में से एक आदेश शासक के आज्ञा का पालन करना भी ही है, जिसे आप की सेवा में पेश करता हूँ, अल्लाह से दुआ है कि अल्लाह हमें दुनिया और आखिरत में सफलता दे।
(1)  देश के शासक की आज्ञा का पालन किया जाएः  देश और राज्य का व्यवस्था उत्तम तरीके से चले, इस के लिए अल्लाह तआला ने जनता को राजा या प्रधानमंत्री जैसे शासकों की आज्ञाकारी का आदेश दिया है जो अल्लाह की अवज्ञाकारी में न हों, जैसा कि अल्लाह का कथन है।
" يا أيها الذين آمنوا أطيعوا الله و أطيعوا الرسول وأولي الأمر منكم فإن تنازعتم في شيء فردوه إلى الله والرسول إن كنتم تؤمنون بالله واليوم الآخر ذلك خير وأحسن تأويلا "  ( النساء: 59 )
" ऐ लोगों जो ईमान लाऐ हो, अल्लाह के आज्ञा का पालन करो, रसूल के आज्ञा का पालण करो, और तुम अपने में से जिम्मेदार लोगों की आज्ञा का पालण करो, और यदि तुम्हारे बीच किसी चीज़ में विभिन्ता हो जाए तो अपने विभिन्ता को अल्लाह और उस के रसूल के प्रवचनों पर रखो, यदि तुम अल्लाह और अन्तिम दिन पर सही तरीके से ईमान रखते हो, यही अच्छा और सब से उत्तम बात है।" ( सूराः निसाः 59)
रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने भी शासकों के आज्ञा का पालन करने बारे में फरमाया है,जैसा कि हदीस में आया है।
عنِ ابْنِ عُمَرَ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، أَنَّهُ قَالَ:  "عَلَى الْمَرْءِ الْمُسْلِمِ السَّمْعُ وَالطَّاعَةُ فِيمَا أَحَبَّ وَكَرِهَ، إِلَّا أَنْ يُؤْمَرَ بِمَعْصِيَةٍ، فَإِنْ أُمِرَ بِمَعْصِيَةٍ، فَلَا سَمْعَ وَلَا طَاعَةَ"  ( صحيح مسلم رقم الحديث: 1839)
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ी अल्लाह अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, " मुस्लिम व्यक्ति पर राजा (प्रधानमन्त्री) की आदेशों को सुनना और उनकी बात पर अमल करना अनिवार्य है चाहे उसे पसन्द आऐ या पसन्द न आऐ, सिवाए कि वह राजा अल्लाह की अवज्ञा का आदेश दे यदि उसने अल्लाह तआला की अवज्ञाकारी का हुक्म दिया तो उसकी बात मानना अनुचित है " (सही मुस्लिमः क्रमांकः 1839)
अच्छी चीज़ो में राजा के आदेश को सुना जाए और उस की बात मानी जाए, यदि वह बहुत अत्यचारिक और भ्रष्टचारिक हो तो भी उस के विरोध में जनता को उभारा न जाए, जब कि उस के पास शक्ति और सत्ता हो जिसका वह दुरुपयोग कर सकता हो, और जनता को अधिक से अधिक हानी पहुंचा सकता हो, यदि वह अल्लाह की नाफरमानी और अत्याचार और बुरी चीज़ों में उसकी आज्ञा का पालन नहीं किया जाऐगा।
(2) शासक के लिए अल्लाह से भय और भलाई के कार्य करने की दुआ की जाएः    राजा के लिए अल्लाह से दुआ किया जाऐ कि अल्लाह उसे सही आचरण वाला बनाए, अल्लाह से भय खाने वाला हो, और जनता के बीच न्याय करने वाला हो और अल्लाह ने जो महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उसे दी है,उसे पूरा करने के लिए नेक और सुन्दर व्यवहार वाले सहयोगी प्रदान करे,
(3) राजा और शासक के भूल चुक और गलतियों का प्रचार न किया जाएः  राजा के पेट पीछे उस की बुराई न की जाऐ, उस के भूल चूक को प्रकाशित न किया जाए और उस पर झूट मुट का इल्ज़ाम न लागाया जाए, उन्हें गाली और बुरा भला न कहा जाए, प्रजा को राजा के विरोध उभारा न जाऐ। उस के ज़ुल्म और अत्याचार पर सब्र की जाए. क्यों कि शासक के गलतियों के प्रचार से देश में अशांती और बिगाड़ पैदा होता है। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सहाबा (साथियों) ने भी शासकों को गाली और बुरा भला कहने से मना किया है।
أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ قَالَ: نَهَانَا كُبَرَاؤُنَا مِنْ أَصْحَابِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: لا تَسُبُّوا أُمَرَاءَكُمْ وَلا تَغِشُّوهُمْ وَلا تَبْغَضُوهُمْ وَاتَّقُوا اللَّهَ واصبروا فإن الأمر قريب.  (السنة لإبن أبي عاصم : رقم الحديث: 1015)
अनस बिन मालिक (रज़ी अल्लाहु अन्हु) कहते हैं, रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथियों में से हमारे बड़े विद्वाने मना करते थे कि और कहते थे "  तुम अपने शासकों को गाली मत दो, उसे बुरा भला न कहो, और उन्हें धोका न दो, और उन से दुश्मनी न करो, और अल्लाह से डरो, और सब्र करो, बेशक मामला बहुत क़रीब है, ( सुन्ना , इब्नि अबी आसिम, हदीस क्रमांकः 1015)
(4) शासक या प्रधानमंत्री और सरकारी कर्मचारियों को सही तरीके से नसीहत किया जाएः  राजा को गुप्त तरीके से नसीहत की जाए, सब लोगों के सामने उस की भूल चुक को प्रकट न की जाए। बल्कि अलग थलग में उसको समझाया जाए, या चिट्ठी के माध्यम से उसे समझाया जाए, जैसा कि तमीम बिन अव्स दारी (रजी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि " दीन नसीहत (सदुपदेश) है। हमने कहाः किस के लिए ऐ अल्लाह के रसूल ? आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया, अल्लाह के लिए और उस की ग्रंथ के लिए और उस के रसूल के लिए और मुसलमानों के विद्धवानों और शासकों के लिए और उनके जनता के लिए"। (सही मुस्लिमः हदीस क्रमांकः 95)
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: إِنَّ اللَّهَ يَرْضَى لَكُمْ ثَلَاثًا، وَيَسْخَطُ لَكُمْ ثَلَاثًا، يَرْضَى لَكُمْ أَنْ تَعْبُدُوهُ، وَلَا تُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا، وَأَنْ تَعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللَّهِ جَمِيعًا، وَأَنْ تَنَاصَحُوا مَنْ وَلَّاهُ اللَّهُ أَمْرَكُمْ، وَيَسْخَطُ لَكُمْ» قِيلَ: وَقَالَ، «وَإِضَاعَةَ الْمَالِ، وَكَثْرَةَ السُّؤَال      ( الموطا للأمام مالك: رقم الحديث:20)
अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, " बैशक अल्लाह तआला तुम्हारे लिए तीन चीज़ों से प्रसन्न होता है और तीन चीज़ों से अप्रिय रहता है, तुम्हारे लिए तीन चीज़ों से प्रसन्न होता है कि तुम केवल अल्लाह ही की इबादत करो, और उस के साथ किसी दुसरे को तनिक भी साझीदार न ठहराओ, और अल्लाह के दीन (धर्म) को मज़बूती से पकड़े रहो, और अल्लाह ने जिसे तुम्हारे ऊपर शासक बनाया है, उसे भली बातों और अच्छी चीज़ों की ओर बुलाते रहो, और अल्लाह तुम्हारे लिए तीन चीज़ों को ना पसन्द करता है, बेकार की बात, तथा विग्रह और धनदौलत के नष्ट करने और बिना लाभ के अधिक प्रश्न करने से बचो " (अल-मुअत्ता, इमाम मालिक, हदीस क्रमांकः 20)
(5)  अच्छे कार्यों में शासक का सहयोग और समर्थन किया जाएः   अच्छी चीजों में राजा और सरकारी कर्मचारियों का सहयोग और समर्थन किया जाए, उनकी मदद की जाए, अशुद्ध कार्य में उनका सहयोग और समर्थन नहीं की जाए। जैसा कि अल्लाह तआला ने संसार के सारे लोगों को आदेश दिया है, कि भलाई के कर्मों में एक दुसरे की सहायता करे,   
" وتعاونوا على البر والتقوى و لا تعاونوا على الإثم والعدوان واتقوا الله , إن الله شديد العقاب" )المائدة : 2(
" और नेकी और अल्लाह की ईबादत के कार्य में एक दुसरे की सहायता करो और गुनाह और ज़्यादती के कामों में किसी का सहयोग न करो, और अल्लाह से डरो, बैशक अल्लाह की सजा बहुत सख्त है।" ( सूरः माइदाः 2)
यही कारण है कि शासक इस बात का ज़्यादा हक्दार है कि अच्छे कार्यों में उस की सहायता और समर्थन किया जाए,
(6) शासक के ज़ुल्म और दूर्व्यवहार पर सब्र किया जाएः  राजा या प्रधानमन्त्री या राज्यसत्ता पर शासक के अत्याचार और ज़्यादती पर सब्र किया जाए, उसके विरोध ऐसा कोई कार्य न की जाए जो समाज के जीवन व्यवस्था को भंग कर दे और समाज को ज़्यादा नुक्सान में ग्रस्त कर दे, ऐसा कोई कार्य नहीं किया जाए जो समाज में बिगाड़ उत्पन करने का कारण हो बल्कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अमीर के अत्याचार और ज़ूल्म पर सब्र करने का आदेश दिया है जैसा कि अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ी अल्लाह अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, " जो व्यक्ति भी अपने अमीर से या उस के मातहत रहने वाले से ऐसी चीज़ देखे जिसे वह नापसन्द करता है तो वह उस पर सब्र करे, क्योंकि बैशक जो व्यक्ति भी जमाअत से थोड़ा भी अलग थलग रहता है तो उसकी मृत्यु पापों के ढेर पर होती है, ( कुफ्र की हालत में उस का निधन होता है।) " (सही बुखारीः हदीस क्रमांकः 7054)
सलमा बिन यज़ीद अलजअफी ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न किया किः ऐ अल्लाह के नबी, यदि हमार ऐसे शासक हों जो हमारे ऊपर आनेवाले अधिकार को ले और हमारे अधिकार को अदा न करे, तो ऐसे स्थिति में हम क्या करें, तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, फिर उन्हों ने दुसरी बार प्रश्न किया, तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, फिर उन्हों ने तिसरी बार प्रश्न किया, तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उत्तर दिया, उसकी बातों को सूनों और उसकी बातें पर अमल करो, बैशक जो कुछ जिम्मेदारी उन्हें दी गई हैं, उसका हिसाब उन से लिया जाऐगा और जो कुछ जिम्मेदारी तुम्हें दी गईं हैं, उसका हिसाब तुम से लिया जाऐगा। (सही मुस्लिमः हदीस क्रमांकः 1846)

इस्लाम धर्म अल्लाह की ओर से भेजा हुआ धर्मं है और मानव की प्रकृतिक आवयश्क्ता के अनुसार अल्लाह ने उसके नियम बनाया है, इसी लिए प्रत्येक मानव के लिए अनुकूल है और सब से महत्वपूर्ण की इस्लाम की सब शिक्षा सुरक्षित है। जो अन्य धर्म इस गर्व से वंचित है।

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