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माता-पिता के हुक़ूक़

प्रेम एक विचित्र मनोभाव है। इसी मनोभाव के कारण मनुष्य मुश्किल से मुश्किल काम को सरलतापूर्वक कर ले जाता है। इसी अनुराग के प्रति उन्नति तथा प्रगति के कृत्तिका नक्षत्र को प्राप्त करता है क्यों कि जिस चीज़ से मनुष्य प्रेम करता है उसे अपने प्राण से भी अधिक प्रेम करता है। अपने आप को उस के लिए बलिदान कर देता है। इसी कारण यदि प्रेम अल्लाह से हो तो पूजा बन जाती है यदि प्रेम नबी स0 अ0 व0 स0 से हो तो अनुसरण का प्रकाश बन जाता है। प्रेम माँ-बाप से हो तो अल्लाह की प्रसन्नता का कारण बन जाता है। अल्लाह तआला सर्व मानव से प्रेम करता है। इसी कारण उसने मानव को एक दुसरे से प्रेम करने की आज्ञा दिया है और तमाम मानव के बीच एक दुसरे पर कुछ ह़ुक़ूक़ एंव अधिकार को अनिवार्य किया है जिसे पूरा करना ज़रूरी है। इन हुकूक और वाजबात में सब से पहला और बड़ा हक़ अल्लाह का है और वह यह कि केवल अल्लाह की उपासना तथा उसी की पूजा की जाऐ और उसके साथ किसी को भागीदार न ठहराया जाए।
एक बार प्रिय नबी स0 अ0 व0 स0 ने मआज़ रजि0 से प्रशन किया।
معاذ . قلت : لبيك رسول الله وسعديك ، قال : هل تدري ما حق الله على عباده , ق…