ईमान का पहला स्तम्भ अल्लाह पर विश्वास तथा ईमान है।

अल्लाह पर विश्वास तथा ईमान का अर्थात यह कि इस बात पर कठोर विश्वास और आस्था हो कि अल्लाह ही हर वस्तु का स्वामी और पालणपोसक है। उसने हर वस्तु को एकेले उत्पन किया है। पूरे संसार को चलाने वाला वही है। धरती और आकाश की हर चीज़ उसके आज्ञा का पालन करती है। तो केवल वही ज़ात उपासना के योग्य है और केवल वही इबादत का हक्दार है। सम्पूर्ण इबादत में उसका कोई भागीदार नही है और उसके अतिरिक्त सब झूटे और असत्य है। अल्लाह तआला ने फरमाया
ذلك بأن الله هو الحق و أن ما يدعون من دونه هو الباطل وأن الله هو العلي الكبير" الحج :62

“ यह इस लिए कि अल्लाह ही सत्य है और वह सब असत्य है जिन्हें अल्लाह को छोड़ कर यह लोग पुकारते हैं और अल्लाह ही उच्च और महान है। ”

अल्लाह तआला अपने विशेष्ताओं और गुनों में सम्पूर्ण है और वह हर कमी और नक्स से पवित्र है।
किसी भी मामूली वस्तु का बिना उसके बनाने वालेके पाया जाना बुद्धि के विरूद्ध है । उदाहरण देता हूँ कि क्या कोई जलपान बिना बावर्ची के स्वयं तैयार हो जाएगी। इसी तरह कोई दुकान खूद बखूद तैयार होजागी और उस में हर तरह का सामान खूद आजाए, और खूद बखूद बिकने लगे , कोइ अक्ल वाला इस बात को नही मानेगा। तो फिर कैसे होसकता कि इतने बड़े संसार, पृथ्वी, आकाश, पलेनेट्स, पैड़ पौदा , पशु पंक्षी , मनुष्य स्वयं उतपन होगए और सुर्य ,चंदर्मां स्वयं निकलने और डुबने लगे, नदिया और चशमे स्वयं बहने लगे, यह सब इस बात की गवाही देती है कि एक ज़ात उपस्थित है जो इन सब को कन्टरोल करता है। इस बड़ी दुनिया का व्यवस्था उसके आज्ञा तथा इच्छानुसार चल रहा है और वह अल्लाह की ज़ात है। एक अल्लाह पर विश्वास और उसका कोई भागीदार और साझीदार नही है। इसे तौहीद कहा जाता है।

तौहीद को तीन विभाग में विभाजन किया जाता है।

(1) तौहीद रूबूबियत
(2) तौहीद उलूहियत
(3) तौहीद अस्मा तथा सिफात

(1) तौहीद रूबूबियत का अर्थात यह है कि आदमी कठोर विश्वास तथा आस्था रखे कि अल्लाह ही तन्हा संसार और उसकी हर वस्तु का मालिक और स्वामी है, वही सम्पूर्ण वस्तु की रचना की है, वही सब को जीविका देता है, वही सब को मृत्यु देता है, वही सब को जीवित करता है। इसी चीज़ को याद दिलाते हुए अल्लाह तआला फरमाता है।
" رب السموات و الأرض و مابينهما إن كنتم مؤقنين – لا إله إلا هو يحي ويميت ربكم ورب آباءكم الأولين " [ الدخان: 8 ]
अर्थातः “ वह आकाशों और धर्ती का रब और हर उस चीज़ का रब जो आकाशों और धर्ती के बीच हैं यदि तुम लोग वास्तव में विश्वास रखने वाले हो, कोई माबूद उसके सिवा नही है। वही जीवन प्रदान करता है और वही मृत्यु देता है। वह तुम्हारा रब है और तुम्हारे उन पुर्वजों का रब है जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं।”

(2) तौहीद उलूहियत का अर्थात यह है कि बन्दा इस बात का इक़्ररार करे कि इबादत और उपासना की सम्पूर्ण किसमें केवल अल्लाह ही के लिए है। अल्लाह तआला ने अपनी इबादत के लिए ही आकाशों और धरती की रचना की और फिर मनुष्य तथा जिनों को इस पर बसाया ताकि वह केवल एक अल्लाह की पूजा करे, अल्लाह ही से आशा लगाए, अपनी हर संकट और परेशानियों में अल्लाह ही को पुकारे, अल्लाह के लिए बलिदान दे, तो जो उसके आज्ञानुसार चलेगा, उसको पुरस्कार देगा, और जो उस के आज्ञा के विरूद्ध चलेगा ,उसको डंडित करेगा। अल्लाह तआला ने मनुष्य तथा जिनों के उत्पन का लक्ष्य अपनी इबादत ही बयान किया है। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन पवित्र कुरआन में है।
" و ما خلقت الجن والإنس إلا ليعبدون" [الذاريات:56 ]
आयत का अर्थातः “ मैं ने जिन और मनुष्य को इसके सिवा किसी काम के लिए पैदा नही किया कि वह मेरी बन्दगी करे ”
अल्लाह तआला ने मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए नबियों और रसूलों को भेजा जैसा कि अल्लाह तआला का पवित्र कुरआन में इरशाद है।
" ولقد بعثنا في كل أمة رسولا أن اعبدوا الله و اجتنبوا الطاغوت " [النحل: 36]
“ हम्ने हर समुदाय में एक रसूल भेजा और उसके द्वूवारा सब को सुचित कर दिया कि अल्लाह ही की बन्दगी करो, और बढ़े हुए अवज्ञाकारी से बचो ”
यही तौहीद उलूहियत के बारे में नबियों और उनके समुदाय के बीच टकराव रहा है। अल्लाह तआला ने विभिन्न तरिके से अपनी उलूहियत को प्रमाणित किया है।
अल्लाह तआला ने सम्पूर्ण मानव को आज्ञा दिया कि वह केवल अल्लाह की पूजा करे और उसके सिवा सर्व झूठे भगवानों को छोड़ दी जाए। इसी में मानव जाती की सफलता और उनका कल्याण है। अल्लाह तआला का कथन पवित्र कुरआन में है।
" ياأيهاالناس اعبدوا ربكم الذي خلقكم و الذين من قبلكم لعلكم تتقون- الذي جعل لكم الأرض فراشا و السماء بناء وانزل من السماء ماء فأخرج به من الثمرات رزقا لكم فلا تجعلوا لله أندادا وأنتم تعلمون " [البقرة: 22]
अर्थातः "लोगों , बन्दगी इख्तियार करो अपने उस रब की जो तुम्हारा और तुम से पहले जो लोग हूऐ हैं उन सब का पैदा करने वाला है। तुम्हारे बचने की आशा इसी प्रकार हो सकती है। वही है जिसने तुम्हारे लिए धर्ती को बिछौना बिछाया, आकाश की छत बनाई ,ऊपर से पानी बरसाया और उसके द्वुवारा हर प्रकार की पैदावार निकाल कर तुम्हारे लिए रोजी जुटाई, अतः जब तुम यह जानते हो तो दुसरों को अल्लाह का समक्ष न ठहराऔ "
मुशरेकीन के माबूद कोई भी काम करने की शक्ति नही रखते बल्कि वह खुद मुह्ताज हैं कि लोग उनकी सेवा करे और उसका खयाल रखे जैसा कि अल्लाह तआला ने एक उधाहरण के माध्यम से लोगों को समझाया है।
" ياأيهاالناس ضرب مثل فاستمعوا له ان الذين تدعون من دون الله لن يخلقوا ذبابا ولو اجتمعوا له وأن يسلبهم الذباب شيئا لا يستنقذوه منه- ضعف الطالب والمطلوب "[ الحج:73]
हे लोगो ! एक मिसाल दी जा रही है, ज़रा ध्यान से सुनो, अल्लाह के सिवाय तुम जिन जिन को पुकारते रहे हो वे एक मक्खी तो पैदा नहीं कर सकते अगर मक्खी उन से कोई चीज़ ले भागे तो यह उसे भी उस से छीन नहीं सकते। बड़ा कमज़ोर है माँगने वाला और बहुत कमज़ोर है जिस से माँगा जा रहा है।
धरती और आकाश की हर चीज़ को अल्लाह तआला ही ने उत्पन किया है। इन सम्पूर्ण वस्तु को वही रोज़ी देता है, सम्पूर्ण वस्तु में वही तसर्रुफ करता है। तो यह बिल्कुल बुद्धि के खिलाफ है कि कुछ लोग अपने ही जैसों या अपने से कमतर की पुजा और उपासना करे, जब कि वह भी उनही की तरह ज़रूरतमन्द और मुह्ताज है। जब मख्लूक में से कोइ भी सच्चा माबूद का हक्दार नही है तो वही इबादत का हक्दार हुआ जिस ने इन सारी चीज़ों को पैदा किया है और वह केवल अल्लाह तआला की ज़ात है जो हर कमी और ऐब से पवित्र है।

(3) तौहीद अस्मा तथा सिफातः अर्थात कि अल्लाह तआला को उनके नामों और विशेष्ताओं में एक माना जाऐ, और अल्लाह के गुनों और विशेष्ताओं तथा नामों में कोई उसका भागिदार नही है। इसी तरह अल्लाह के इन विशेष्ताओं और गुनों को वैसे ही माना जाऐ जिस तरह अल्लाह ने उसको अपने लिए बताया है या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस विशेष्ता के बारे में खबर दिया है और उन विशेष्ताओं और गुनों को न माना जाऐ जिस विशेष्ता का इन्कार अल्लाह ने अपने से किया है या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस विशेष्ता का इन्कार किया है । जैसा कि अल्लाह तआला का कथन पवित्र कुरआन में है।
" ليس كمثله شيء وهوالسميع البصير "
“ अल्लाह के जैसा कोई नही है और अल्लाह तआला सुनता और देखता है।”
इस लिए अल्लाह के सिफात और गुनों को वैसे ही माना जाऐ जैसा कि अल्लाह ने खबर दिया है या उसके नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने खबर दिया है। न ही उस सिफात के अर्थ को बदला जाए और न ही उसके अर्थ का इनकार किया जाए और न ही उस सिफात की कैफियत बयान किया जाए और न ही दुसरे किसी वस्तु से उसकी उदाहरण दी जाए, बल्कि यह कहा जाए कि अल्लाह तआला सुनता है, देखता है, जानता है, शक्ति शाली है जैसा कि इस के शान के योग्य है, वह अपनी विशेष्ता में सम्पूर्ण है। कोई भी वस्तु उस जैसा नही हो सकता और न ही उस के विशेष्ता में भागिदार हो सकता है। इसी तरह इन सर्व विशेष्ताओं और गुनों की अल्लाह से इन्कार किया जाए जिस का इन्कार अल्लाह ने अपने नफ्स से किया है। या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस सिफत का इन्कार अल्लाह से किया है। यह आस्था रखते हेतु कि इस सिफत के विपरित सिफत में अल्लाह सम्पूर्ण और कमाल को है। इसी तरह अल्लाह के बारे में ऐसे नाम या विशेष्ता का प्रयोग न किया जाए जिनका जिक्र न तो कुरआन में है और न ही उस की नफी की गइ है, तो एसे नामों और विशेष्ताओं के बारे में खामुशी और कुछ न कहना उचित और उत्तम है। बल्कि उस शब्द का विस्तार से अर्थात पूंछना जरूरी है। यदि विस्तारित अर्थात के समय कोई कमी या अल्लाह की शान में खराबी का माना पाया जाता है तो उसका इन्कार अनिवार्य है। जैसाकि अल्लाह तआला का आज्ञा है।
"و لله الأسماء الحسنى فادعوه بها و ذروا الذين يلحدون في أسمائه سيجزون ما كانوايعملون" [الأعراف: 180]
इस आयत का अर्थातः अल्लाह अच्छे नामों का अधिकारी है। उसको अच्छे ही नामों से पुकारो और उन लोगों को छोड़ दो जो उसके नाम रखने में सच्चाइ से हट जाते है, जो कुच्छ वह करते हैं वह उसका बदला पा कर रहेंगे।

अल्लाह तआला की विशेष्ता दो तरह की है।

(1) अल्लाह की व्यक्तिगत विशेष्ताः अल्लाह तआला इस विशेष्ता से हमेशा से है और हमेशा रहेगा उदाहरण के तौर पर , अल्लाह का ज्ञान , अल्लाह का सुनना , देखना , अल्लाह की शक्ति , अल्लाह का हाथ, अल्लाह का चेहरा, आदि और इन विशेष्ता को वैसे ही माना जाए जैसा कि अल्लाह तआला के योग्य है और न ही इन विशेष्ताओं के माना को परिवर्तन की जाए और न ही इन विशेष्ताओं के माना का इन्कार की जाए और न ही इन विशेष्ताओं को दुसरे किसी वस्तु से उदाहरण दी जाए और न ही इन विशेष्ताओं की अवस्था या हालत बयान की जाए।

(2) अल्लाह की इख्तियारी विशेष्ताः यह वह विशेष्ता है जो अल्लाह के इच्छा और इरादा पर निर्भर करता है। यदि अल्लाह चाहता है तो करता और नही चाहता तो नही करता, उदाहरण के तौर पर यदि अल्लाह तआला किसी दास के अच्छे काम पर प्रसन्न होता है तो किसी दास के बुरे काम पर अप्रसन्न होता है, किसी दास के अच्छे काम से खुश को कर उसे ज़्यादा रोज़ी देता है तो किसी के बदले को परलोकिक जीवन के लिए सुरक्षित कर देता है जैसा वह जाहता है करता है आदि ।

अल्लाह तआला पर विश्वास तथा ईमान रखने से कुच्छ लाभ प्राप्त होते हैं।

(1) अल्लाह पर विश्वास और उस के नामों तथा विशेष्ताओं पर विश्वास से अल्लाह की महानता का ज्ञान हुता है।
(2) अल्लाह तआला से प्रेम और अनुराग बढ़ता है जिस के कारण अल्लाह के आज्ञानुसार जीवन गुज़ार की शक्ति प्राप्त होती है।
(3) अल्लाह तआला के शक्ति और नराज़गी से डर और भय का एहसास होता है और बुराई और अपराध से बचता है।

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