सब का मालिक एक

हमारे जहन में यह प्रश्न बार बार आता है कि ईश्वर कैसा हो ? उस के गुन कैसे हों ? वह कहाँ स्थापित हैं ?
ईश्वर एक ऐसा शब्द है जो जहन में आते ही एक बहुत ही महान वक्तित्व की कल्पना जहन में आता है जो हर वस्तु का स्वामी और पालणपोषक हो। उसने हर वस्तु को एकेले ही उत्पन किया हो, पूरे संसार को चलाने वाला वही हो, धरती और आकाश की हर चीज़ उसके आज्ञा का पालन करती हो, अपनी सम्पूर्ण विशेष्ताओं और गूनों में पूर्ण हो, जिसे खाने पिने की आवशक्ता न हो, विवाह और वंश तथा संतान की ज़रूरत न हो, तो केवल वही ज़ात उपासना के योग्य होगी और केवल वही इबादत की हक्दार होगी।
अल्लाह तआला ही केवल वह ज़ात है जो सब गूनों और विशेष्ताओं में पूर्ण है। जिस में से कुछ का ज्ञान उसने अपने दूतों और पुस्तकों के माध्यम से दिया है और कुछ अपने पास गुप्त रखा है तो उन नामों और गूनों एवं विशेष्ताओं को वैसे ही माना जाए जिस प्रकार उस का बयान हुआ है।
अल्लाह तआला की कुछ महत्वपूर्ण विशेष्ता पवित्र कुरआन की इन आयतों से स्पष्ठ होती हैं।

ऐ नबी कहो, वह अल्लाह यकता है, अल्लाह सब से निरपेक्ष है और सब उसके मुहताज हैं। न उस की कोई संतान है और न वह किसी की संतान। और कोई उसका समकक्ष नहीं है। ( सूरः अल-इख्लास)

और कुरआन के दुसरे स्थान पर अल्लाह ने अपनी यह विश्ष्ता बयान किया है।
( وأن الله هو العلي الكبير" ( الحج : 62
“ और निः संदेह अल्लाह ही उच्च और महान है। ( सूरः अल- हजः 62)

अल्लाह तआला अपने विशेष्ताओं और गुनों में सम्पूर्ण है और वह हर कमी और नक्स से पवित्र है।
अल्लाह तआला की कुछ महत्वपूर्ण विशेष्ताओं और गुनों का बयान इन आयतों से होता हैं।
الله لا اله إلا هو , الحيّ القيوم , لا تأخذه سنة و لا نوم , له ما في السموات وما في الأرض , من ذالّذي يشفع عنده إلا بإذنه , يعلم ما بين أيديهم وما خلفهم , ولا يحيطون بشيء من علمه إلا بما شاء , وسع كرسيّه السموات والأرض , ولا يؤده حفظهما , وهو العلي العظيم, لااكراه في الدين , قد تبين الرشد من الغيّ ,فمن يكفر بالطاغوت ويؤمن بالله فقد استمسك بالعروة الوثقى , لا انفصام لها , والله سميع عليم
इस आयत का अर्थः अल्लाह वह जीवन्त शाश्वत सत्ता, जो सम्पूर्ण जगत् को सँभाले हुए है, उस के सिवा कोई पुज्य नही हैं। वह न सोतो और न उसे ऊँघ लगती है। ज़मीन और आसमानों में जो कुछ है, उसी का है। कौन है जो उस के सामने उसकी अनुमति के बिना सिफारिश कर सके ? जो कुछ बन्दों के सामने है उसे भी वह जानता है और जो कुछ उस से ओझल है, उसे भी वह जानता है और उसके ज्ञान में से कोई चीज़ उनके ज्ञान की पकड़ में नहीं आ सकती, यह और बात है कि किसी चीज़ का ज्ञान वह खुद ही उनको देना चाहे। उसका राज्य आसमानों और ज़मीन पर छाया हुआ है और उनकी देख रेख उसके लिए थका देने वाला काम नहीं है। बस वही एक महान और सर्वोपरि सत्ता है , दीन ( धर्म) के मामले में कोई जोर ज़बरदस्ती नहीं है। सही बात गलत विचारों से अलग छाँटकर रख दी गई है। अब जिस किसी ने बढ़े हुए फसादी का इनकार करके अल्लाह को माना, उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटने वाला नही और अल्लाह सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है। ( सूरः अल- बकराः 256)

अल्लाह तआला ही तने तन्हा संसार और उसकी हर वस्तु का मालिक और स्वामी है, उसी ने सम्पूर्ण वस्तु की रचना की है, वही सब को जीविका देता है, वही सब को मृत्यु देता है, वही सब को जीवित करता है। इसी चीज़ को याद दिलाते हुए अल्लाह तआला फरमाया है।
رب السموات و الأرض و مابينهما إن كنتم مؤقنين – لا إله إلا هو , يحي ويميت ربكم ورب آباءكم الأولين " [ الدخان
अर्थातः “ वह आकाशों और धर्ती का रब और हर उस चीज़ का रब जो आकाशों और धर्ती के बीच हैं यदि तुम लोग वास्तव में विश्वास रखने वाले हो, कोई माबूद उसके सिवा नही है। वही जीवन प्रदान करता है और वही मृत्यु देता है। वह तुम्हारा रब है और तुम्हारे उन पुर्वजों का रब है जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं।” (सूरः दुखान)

इसी तरह अल्लाह तआला को उनके नामों और विशेष्ताओं में एक माना जाऐ, और अल्लाह के गुनों और विशेष्ताओं तथा नामों में कोई उसका भागिदार नही है।
इसी तरह अल्लाह के इन विशेष्ताओं और गुनों को वैसे ही माना जाऐ जिस तरह अल्लाह ने उसको अपने लिए बताया है या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस विशेष्ता के बारे में खबर दिया है और उन विशेष्ताओं और गुनों को न माना जाऐ जिस विशेष्ता का इन्कार अल्लाह ने अपने से किया है या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस विशेष्ता का इन्कार किया है, जैसा कि अल्लाह तआला का कथन पवित्र कुरआन में है।
" ليس كمثله شيء وهوالسميع البصير "
“ अल्लाह के जैसा कोई नही है और अल्लाह तआला सुनता और देखता है।” ( सूरः शूराः 42)

इस लिए अल्लाह के सिफात और गुनों को वैसे ही माना जाऐ जैसा कि अल्लाह ने खबर दिया है या उसके नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने खबर दिया है। न ही उस सिफात के अर्थ को बदला जाए और न ही उसके अर्थ का इनकार किया जाए और न ही उस सिफात की कैफियत बयान की जाए और न ही दुसरे किसी वस्तु से उसकी उदाहरण दी जाए, बल्कि यह कहा जाए कि अल्लाह तआला सुनता है, देखता है, जानता है, शक्ति शाली है जैसा कि अल्लाह के शान के योग्य है, वह अपनी विशेष्ता में सम्पूर्ण है। कोई भी वस्तु उस जैसा नही हो सकता और न ही उस के विशेष्ता में भागिदार हो सकता है।
इसी तरह उन सर्व विशेष्ताओं और गुनों को अल्लाह से इन्कार किया जाए जिस का इन्कार अल्लाह ने अपने नफ्स से किया है या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस सिफत का इन्कार अल्लाह से किया है। यह आस्था रखते हेतु कि इस सिफत के विपरित सिफत में अल्लाह सम्पूर्ण और कमाल को है और जिस शब्द से अल्लाह के नाम या विशेष्ताओं में कमी या खराबी पाया जाए तो उसका इन्कार अनिवार्य है। जैसाकि अल्लाह तआला का आज्ञा है।
و لله الأسماء الحسنى فادعوه بهاوذرواالذين يلحدون في أسمائه سيجزون ما كانوايعملون [الأعراف:180
अर्थातः अल्लाह अच्छे नामों का अधिकारी है। उसको अच्छे ही नामों से पुकारो और उन लोगों को छोड़ दो जो उसके नाम रखने में सच्चाइ से हट जाते है, जो कुच्छ वह करते हैं वह उसका बदला पा कर रहेंगे।

अल्लाह तआला की विशेष्ता दो तरह की है।
(1) अल्लाह की व्यक्तिगत विशेष्ताः अल्लाह तआला इस विशेष्ता से हमेशा से है और हमेशा रहेगा, उदाहरण के तौर पर , अल्लाह का ज्ञान , अल्लाह का सुनना , देखना , अल्लाह की शक्ति , अल्लाह का हाथ, अल्लाह का चेहरा, आदि और इन विशेष्ता को वैसे ही माना जाए जैसा कि अल्लाह तआला के योग्य है और न ही इन विशेष्ताओं की अर्थात को परिवर्तन की जाए और न ही इन विशेष्ताओं के अर्थात का इन्कार की जाए और न ही इन विशेष्ताओं को दुसरे किसी वस्तु से उदाहरण दी जाए और न ही इन विशेष्ताओं की अवस्था या हालत बयान की जाए।

(2) अल्लाह की इख्तियारी विशेष्ताः यह वह विशेष्ता है जो अल्लाह के इच्छा और इरादा पर निर्भर करता है। यदि अल्लाह चाहता है तो करता और नही चाहता तो नही करता, उदाहरण के तौर पर यदि अल्लाह तआला किसी दास के अच्छे काम पर प्रसन्न होता है तो किसी दास के बुरे काम पर अप्रसन्न होता है, किसी दास के अच्छे काम से खुश को कर उसे ज़्यादा रोज़ी देता है तो किसी के बदले को परलोकिक जीवन के लिए सुरक्षित कर देता है जैसा वह चाहता है करता है आदि ।

इसी लिए केवल उसी की पूजा और उपासना की जाए। उस की पूजा तथा इबादत में किसी को भागिदार न बनाया जाए। अल्लाह तआला ने लोगों को अपनी इन नेमतों को याद दिलाते हुए पूरे मानव को अपनी पूजा का आज्ञा दिया है।

ياأيهاالناس اعبدوا ربكم الذي خلقكم و الذين من قبلكم لعلكم تتقون- الذي جعل لكم الأرض فراشا و السماء بناء وانزل من السماء ماء فأخرج به من الثمرات رزقا لكم فلا تجعلوا لله أندادا وأنتم تعلمون " [البقرة: 22
अर्थातः "लोगों , पूजा करो अपने उस रब (मालिक) की जो तुम्हारा और तुम से पहले जो लोग हूऐ हैं उन सब का पैदा करने वाला है। तुम्हारे बचने की आशा इसी प्रकार हो सकती है। वही है जिसने तुम्हारे लिए धर्ती को बिछौना बिछाया, आकाश की छत बनाई, ऊपर से पानी बरसाया और उसके द्वुवारा हर प्रकार की पैदावार निकाल कर तुम्हारे लिए रोजी जुटाई, अतः जब तुम यह जानते हो तो दुसरों को अल्लाह का समक्ष न ठहराऔ "
जो लोग आकाश एवं धरती के मालिक को छोड़ कर मृतक मानव, पैड़, पौदे, पथरों और कम्ज़ोर वस्तुओं को अपना पूज्य बना लेते हैं जो कोई भी काम करने की शक्ति नही रखते बल्कि वह खुद ज़रूरत मन्द हैं कि लोग उनकी सेवा करे और उसका खयाल रखे जैसा कि अल्लाह तआला ने एक उधाहरण के माध्यम से लोगों को समझाया है।
ياأيهاالناس ضرب مثل فاستمعوا له ان الذين تدعون من دون الله لن يخلقوا ذبابا ولو اجتمعوا له وأن يسلبهم الذباب شيئا لا يستنقذوه منه- ضعف الطالب والمطلوب "[ الحج:73
हे लोगो ! एक मिसाल दी जा रही है, ज़रा ध्यान से सुनो, अल्लाह के सिवाय तुम जिन जिन को पुकारते रहे हो वे एक मक्खी तो पैदा नहीं कर सकते अगर मक्खी उन से कोई चीज़ ले भागे तो यह उसे भी उस से छीन नहीं सकते। बड़ा कमज़ोर है माँगने वाला और बहुत कमज़ोर है जिस से माँगा जा रहा है।

धरती और आकाश की हर चीज़ को अल्लाह तआला ही ने उत्पन किया है। इन सम्पूर्ण वस्तु को वही रोज़ी देता है, सम्पूर्ण वस्तु में वही तसर्रुफ करता है। तो यह बिल्कुल बुद्धि के खिलाफ है कि कुछ लोग अपने ही जैसों या अपने से कमतर की पुजा और उपासना करे, जब कि वह भी उनही की तरह ज़रूरतमन्द और मुह्ताज है। जब मख्लूक में से कोइ भी सच्चा माबूद का हक्दार नही है तो वही इबादत का हक्दार हुआ जिस ने इन सारी चीज़ों को पैदा किया है और वह केवल अल्लाह तआला की ज़ात है जो हर कमी और ऐब से पवित्र है।

अल्लाह तआला कहाँ है ?

अल्लाह तआला आकाश के ऊपर अपने अर्श (राजगद्दी) पर है। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है।
" (الرحمن على العرش استوى " ( سورة طه: 5
इस आयत का अर्थः वह करूणामय स्वामी ( जगत के) राज्य सिंहासन पर विराजमान है।
यही कारण है कि प्रत्येक मानव जब बहुत कठिनाई तथा संकट में होता है तो वह आकाश की ओर देखते हुए प्राथना करता है कि ऐ ईश्वर तू मुझे इस संकट तथा परेशानी से निकाल दे और बार बार उस की निगाह आसमान की ओर उठती है। किन्तु जब वह खुशहाली में होता तो उसे छोड़ कर अन्गिनित द्वारों का चक्कर काटता है और अपने व्यक्तिगत को रुसवा तथा ज़लील करता है।
गोया कि हर मानव का हृदय कहता है कि ईश्वर ऊपर है परन्तु रितिरेवाज के चक्कर में अपने वास्तविक पालनहार को छोड़ कर बेजान वस्तुओं की भक्ति में ग्रस्त है जिस का उसे लाभ प्राप्त न होगो और नुक्सान एवं हाणि उठाएगा।

अल्लाह तआला हम सब को वास्तविक घाटा और सम्पूर्ण प्रकार के हाणि से सुरक्षित रखे। आआमी।।।।।।।न

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