पति और पत्नी के ह़ुक़ूक (अधिकार)



अल्लाह तआला ने मनुष्य की रचना की और मनुष्य को दो महत्वपूर्ण लिंग में बांट दिया। पुरूष तथा महिला , यह जीवन के दो चक्के हैं जिस पर जीवन की गाड़ी चलती है या एक सिक्के के दो रुख हैं। जो एक दुसरे को शक्ति और सुख शांति प्रदान करते है और एक दुसरे के बिना अधूरा हैं। जिस में दोनो की शारीरिक और मानसिक शक्ति अलग अलग है और जीवन की गाड़ी को सही तरीके से चलाने के लिए एक पवित्र बंधन से बांध दिया है। जिसे विवाह कहा जाता है। यही कारण है कि सम्पूर्ण धर्मों में विवाह के माध्यम से पुरूष और महिला के संबंध को उचित कहा गया है और बिना विवाह के अवैध माना गया है और ऐसे संबंध को बहुत बड़ा पाप और ऐसे व्यक्तियों को विभिन्न सजा का आदेश है। ......
इस्लाम ने पति और पत्नी के कार्य और एक दुसरे के प्रति कुछ हुक़ूक को अनिवार्य किया है ताकि जीवन की गाड़ी अच्छे तरीके चले, तो कुछ हुक़ूक़ ऐसे हैं जो देनो के एक दुसरे के प्रति अदा करें,
मुश्तरक हुक़ूक़ः
(1)  विवाह के समय रखे गये शर्तों को पूरा किया जाएः  शादी , विवाह एक जीवन भर के लिए एक समझौता है जो दोनो पक्ष एक दूसरे से करते हैं, तो इन शर्तों को पूरा करना ज़रूरी है जब कि वह उचित शर्त हो जैसा कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " उन पण बंध को पूरा करना बहुत आवश्यक है जिस के माध्यम से तुमने विवाह किया है। " (सही बुखारी-मुस्लिम)
परन्तु जो पण बंध अल्लाह के आदेश का उलंघन करे तो ऐसे शर्तों पर अमल नहीं किया जाऐगा जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने स्पष्ठ कर दिया है, " हर वह शर्त जो अल्लाह की पुस्तक में नहीं है वह बातिल है।" (सुनन इब्नि माजा)
(2)  पति पत्नी एक दूसरे से शारीरिक लाभ उठाएः  अल्लाह तआला ने महिला को पुरूष और पुरूष को महिला के लिए पैदा किया है ताकि एक दूसरे की मानव आवश्यक्ता को पूरी करे, जब पति बुलाए तो पत्नी इन्कार करे और पत्नी बुलाए तो पति इनकार करे, जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है, " जब पति अपने पत्नी को अपने बिस्तर पर बुलाए और पत्नी आए और पति गुस्सा होकर रात गुज़ारे तो फरिश्ते उस महीला पर रात भर धिक्कार भेजते हैं।" (सही बुखारी-मुस्लिम)
इसी प्रकार जब पुरूष के लिए भी अनिवार्य है कि वह अपने पत्नी की शारीरिक आवश्यक्ता को पूरी करे जैसा कि हदीस में वर्णित है कि " नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सलमान और अबू दर्दा (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) को भाई भाई बना दिया था, तो सलमान (रज़ी अल्लाहु अन्हु) अबू दर्दा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) के घर गये तो अबू दर्दा की पत्नी को बिना सिंघार के देखा तो कहा, तुम एसे क्यों रहती हो ? तो उसने उत्तर दिया कि तुम्हार भाई अबू दर्दा नमाज रोज़ा करता है, उसे दुनियादारी से कोई मतलब नहीं, तो जब अबू दर्दा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) घर तश्रीफ लाए तो उनके लिए खाना तैयार किया और कहा आप खाओ, मैं रोजे से हूँ, तो सलमान (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने कहा, जब तक तुम नहीं खाओगे, मैं नही खाऊंगा, तो दोनो खाना खाये, जब रात हूई तो अबू दर्दा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) नमाज़ पढ़ने के लिए खड़े हूए तो सलमान (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने कहा, जाओ, सो जाओ, कुछ समय के बाद तहज्जुद की नमाज़ के लिए उठे तो फिर कहा, जाओ, सो जाओ, और जब रात का अन्तिम हिस्सा हुआ तो उन्हें उठाया और दोनों नमाज़ पढ़ी, और सलमान (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने कहा, बैशक तुम पर तुम्हारे रब का हक है, तुम पर तुम्हारे शरीर का हक है, तुम पर तुम्हारी पत्नी का हक है, तो प्रत्येक हकदार को उस का हक अदा करो, और अबू दर्दा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास आऐ और इस घटना को बयान फरमाया तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उत्तर दिया कि " सलमान ने सच कहा है।" (सही बुखारी)
(3)  उत्तम और सुन्दर समाजिकताः  अल्लाह तआला ने पुरूष और महिला की रचना की और उन्हें पति और पत्नी के संबंध से जोड़ कर एक साथ जीवन बिताने का आदेश दिया और एक दुसरे के साथ सुन्दर व्यवहार करने का आदेश दिया है। ताकि एक उत्तम परिवार का निर्माण हो, जरा ध्यानपुर्वक सर्वशक्तिमान, सृष्टिकर्ता, मालिक के कथन को पढ़ें, " उन के साथ भले ढंग से रहो-सहो। अगर वे तुम्हें पसन्द हों तो हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें पसन्द हो मगर अल्लाह तआला ने उसी में बहुत कुछ भलाई रख दी हो," (सूराःअन्-निसाः19)  
(4)  प्रेम, दयालुता और आदर-सम्मानः  पति और पत्नी दोनो एक दुसरे के दुख सुख के साथी हैं, प्रत्येक स्थिति में एक दुसरे के लिए प्रेम, दयालुता, सहायता का व्यवहार किया जाए। अल्लाह तआला ने मुहब्बत और कृपा को याद दिलाया है, " और उसकी निशानियों में से यह है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हारे ही सहजाति से बीवियाँ बनाईं ताकि तुम उनके पास शान्ति प्राप्त करो और तुम्हारे बीच प्रेम और दयालुता पैदा कर दी, यक़ीनन इस में बहुत सी निशानियाँ हैं  उन लोगों के लिए जो सोच विचार करते हैं।" (सूराः रूमः21)  
एक दुसरे के प्रति दुनिया और आखिरत की भलाई को ध्यान रखा जाए और भलाई और पुण्य के कार्यों में समर्थन किया जाए। पाप और अपराध में समर्थन किया जाए बल्कि बुराईयों की खराबियों और नुक्सान से डराया जाए, एक दुसरे का आदर-सम्मान किया जाए। ऐसी बातों से परहेज़ किया जाए जो एक दुसरे के हृदय को तक्लिफ पहुंचाए, दुखी कर दे और एक दुसरे से प्रेम और दयालुता का व्यवहार किया जाए। एक दुसरे के साथ दुर्व्यवहार करने में अल्लाह से डरते रहें, अल्लाह तआला हमारे कर्मों और व्यवहारों को देखता है, ज़रा अल्लाह के इस कथन पर धयान पुर्वक विचार करें" आपस में उदारता और दानशीलता को भूलो, तुम्हारे कर्मों को अल्लाह देख रहा है।" ( सूराः बक़राः 237)
(5)   पति पत्नी की बीच शारीरिक संबंध को गुप्त रखा जाएः  पति पत्नी एक दूसरे के बहुत निकट होते हैं, एक दुसरे के हर चीज़ को जानते है, इसी लिए आपस में होने वाले संबंध और प्यार मोहब्बत की बातें मित्रो या सहेलियों को बयान किया जाए बल्कि गुप्त रखे जिस तरह लिबास मानव के शरीर के अंगों को छुपाता है, अल्लाह तआला ने पति पत्नी के निकटता को इस प्रकार बयान फरमाया है, "  वह तुम्हारे लिए लिबास है और तुम उनके लिए लिबास हो, " (सूराः बकरा, 187)
और जो अपने पति और पत्नी के बीच होने वाली चीजों को लोगों को बयान करते हैं या इन्टरनेट पर डाल देते हैं, ऐसे लोग अल्लाह के पास सब से बुरे हुंगे, सब से बड़े पापी होंगे जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है, " बैशक क़ियामत के दिन अल्लाह के पास सब से बुरा व्यक्ति वह होगा कि पुरूष अपनी पत्नी के पास जाए और पत्नी अपने पति के पास आऐ और फिर उन दोनों के बीच होने वाली चीज़ो को प्रकाशित कर दिया जाए। " (सही मुस्लिम)
(6)  विरासत (तरके) का अधिकारः अल्लाह तआला ने महिला और पुरूष को अपने निकटतम संबंधियों के निधन के बाद उनके छोड़े हुए धनदौलत में हकदार बनाया है। इसी प्रकार पति अपने पत्नी के देहांत के बाद उसके छोड़े हुए धनदौलत में हकदार होगा और पत्नी अपने पति के देहांत के बाद उसके छोड़े हुए धनदौलत में हकदार होगी। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है, " और तुम्हारी बीवियों ने जो कुछ छोड़ा हो उसका आधा हिस्सा तुम्हें मिलेगा अगर वे निस्सन्तान हों, वरना सन्तान होने की स्थिति में तरके का एक चौथाई हिस्सा तुम्हारा है, जबकि वसीयत जो उन्हों ने की हो पूरी कर दी जाए और क़र्ज़ जो उन्हों ने छोड़ा हो चुका दिया जाए और वे तुम्हारे तरके में से चौथाई की हकदार होंगी अगर तुम निस्सन्तान हो, वरना तुम्हारे सन्तानवाले होने की स्थिति में उनका हिस्सा आठवाँ होगा, इसके बाद कि जो वसीयत तुम ने की हो वह पूरी कर दी जाए और जो क़र्ज़ तुम ने छोड़ा हो वह चुका दिया जाए " ( सूरः अन-निसाः 12)
पति का अपने पत्नी पर अधिकारः
(1)  अच्छी बातों में, भलाइ और अल्लाह की इबादतों में पत्नी अपने पति के आदेश को माने,
पति के कहने के अनुसार चले, पति के अवज्ञा करे, क्यों कि जो महिला अल्लाह के आदेश के अनुसार चलती है और अपने पति की बात मानती है तो अल्लाह तआला ऐसी महिला को जन्नत के जिस द्वार से चाहे प्रवेश हो की अनुमति देगा जैसा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है, " जब महिला पांच समय का नमाज़ पढ़ती है, रमज़ान का रोज़ा रखती है, अपने इज़्ज़त की रक्षा करती है, अपने पति की बात मानती है, तो उस से कहा जाऐगा जन्नत के जिस द्वार से चाहे तू प्रवेश कर, ( आदाबुज़्ज़ुफाफ, अलबानी)
  रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न किया गया, कौन सी स्त्री सब से उत्तम और सर्वशेष्ठ है ?  तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उत्तर दिया, जब पति उसकी ओर देखे तो खुश हो, और कोइ आदेश दे तो वह उसकी बात माने, और अपने प्रति और अपने धनदौलत में पति की मुखालफत करे, (सुनन नसई, अलबानी ने इस हदीस को सही कहा है)
परन्तु यह भी याद रहे कि यदि पति अल्लाह की अवज्ञाकारी की ओर बुलाए तो उन की बात मानी जाए, उन्हें अल्लाह की आदेश को याद दिलाया जाए, पाप और अपराध के कार्यों में सहायता और सहयोग किया जाए। जैसा कि रसूलुल्लाह ने फरमाया है, " अल्लाह की नाफरमानी में किसी मानव की बात मान्ना उचित नहीं है और भले बातों में किसी की अनुपालण की जाऐगी " ( )
(2)    पति का ख्याल और बच्चों की पालन पोषण की ज़िम्म्दारी अदा करे,
जब सहाबियात (रज़ी अल्लाहु अन्हुन्न) की जीवन को देखते हैं तो वह लोग अपने पतियों के आदेश को मानती थीं और अपने पति के घर बार को संभालने में बहुत कष्ठ उठाती थीं, रसूलुल्लाह की प्रिय बेटी फातिमा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) अपने घर का सारा काम करती थीं, और ज़्यादा काम के कारण उनके हाथ में छाले पड़ जाते थे। अबू बकर (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की पुत्री अस्मा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) की विवाह जुबैर बिन अव्वाम (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से हुआ था, जुबैर के घोड़े की देख भाल और घर के लिए पानी लाना उन के लिए बहुत कष्ठ का कारण था परन्तु वह सब करती थीं,
(3)   पति की उपस्थिति में पति के अनुमति के बिना नफली रोज़ा न रखे,
पति जब साथ में रहता हो तो पति के अनुमति के बाद ही नफली रोज़े रखेगी, यदि पति नफली रोज़े से मना कर दे तो नफली रोज़े नही रखेगी, जैसा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है, " किसी महिला के लिए उचित नही कि वह बिना पति के अनुमति के रोज़ा रखे हालाँकि उस का पति उस के साथ हो " (सही बुखारी और मुस्लिम) 
(4)   पति के घर, धनदौलत और इज़्ज़त-आबरू की रक्षा करे,
महिला घर पर होती है, पति रोजी कमाने के लिए घर से बाहर अपने व्यपार में, खेती बारी में, कार्यलय में व्यस्त रहता है, या अपना घर बार छोड़ कर दुसरे शहरो और विदेशों में रहता है और घर की ज़िम्मेदारी पत्नी के पास रहती है, इस लिए पत्नी पति के धनदौलत के साथ साथ अपने मान मर्यादा, सतीत्व की सुरक्षा करे, और अल्लाह तआला इन चीज़ों के प्रति उस से प्रश्न करेगा, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है, " स्त्री अपने पति के घर और बच्चों की ज़िम्मेदार है और उस से उस के बारे में प्रश्न किया जाऐगा, " (सही बुखारी और मुस्लिम) 
(5)  पति के अनुमति के बिना किसी को अपने घर न आने दे,
पत्नी अपने घर में उन लोगों और महिलाओं को आने दे जिसे पति नापसन्द करते हों, उन लोगों से बात चीत करे जिस से बात करने से पति ने मना कर दिया हो, खास कर जब वह अपने करीबी रिश्तेदार हों, बहुत सारे झगड़े और लड़ाई की जड़ भी यही है, कभी विवाह विच्छेद (तलाक़) का कारण बनता और कभी हत्या का कारण बतना है, इसी लिए रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पति और पत्नी के बीच होने वाले आशंका को खत्म करते हुए फरमाया है, सूनो, तुम्हारी पत्नीयों पर तुम्हारा अधिकार है और तुम्हारी पत्नियों का अधिकार तुम पर है, तो तुम्हारे अधिकार में से है कि तुम्हारे बिस्तर पर उसे बैठने दे जिसे तुम नापसन्द करते हो और  उसे अपने घर में न आने दो जिसे तुम नापसन्द करते हो " ( सुनन तिर्मिज़ी)
पत्नी का अपने पति पर अधिकारः
(1)  पत्नी को हक्के महर अदा करेः पति पर सब से पहला ह़क़ यह कि विवाह के समय आपस में तय शुदा महर अदा करे, महर कहा जाता है उस राशी को जो विवाह के समय महिला को उसका पति पत्नी बनाने के बदले देगा। यह पति की आर्थिक क्षमता पर निर्भर करता है, स्त्री भी अपने लिए ज़्यादा महर तलब कर सकती है, परन्तु सब से उत्तम और बरकत वाली विवाह वह है जिस में कम से कम खर्च हो जैसा कि प्रिय रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीस से प्रमाणित है, पत्नी को महर देना अनिवार्य है जो लोग अपनी पत्नी को महर नहीं देते ऐसे लोग पापी होंगे जैसा कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है। " जिस किसी व्यक्ति ने किसी लड़की से कम या ज़्यादा महर पर विवाह किया और उसके हृदय में पत्नी के हक्क महर को अदा करने की इच्छा नही है तो उसने पत्नी को धोखा दिया है और बिना पत्नी के महर को दिये हुए निधन कर गया तो वह अल्लाह से क़ियामत के दिन भेंट करेगा इस स्थिति में कि वह व्यभिचारी होगा।" (सहीहुत्तरगीब वत्तर्हीब)
(2) पत्नी के खाने-पीने और रहने के लिए घर का व्यवस्था करे,
पत्नी के रहने और खाने-पीने का व्यवस्था करे, अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार खाने पीने की वस्तु ला कर दे, उनके आवश्यकता को पूरी करे, जैसा कि मुआविया अल-क़ुशौरी (रज़ी अल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि मैं ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न किया कि पत्नी का अपने पति पर क्या अधिकार है ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उत्तर दिया, जो तुम खाओं उसे खिलाओ, जैसा तुम कपड़ा पहनो उसे पहनाओ और पत्नी के चेहरे पर न मारो और उसे बुरा भला न कहो और उसे घर के सिवा दुसरे स्थानों पर न छोड़ो " (सहीहुत्तरगीब वत्तर्हीब)
अपने घर वालो पर खर्च करना दुसरे लोगो पर खर्च करने से ज़्यादा उत्तम है। जैसा कि अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, एक दीनार (रुपीया) जो तुम अल्लाह के रास्ते में खर्च करते हो और एक दीनार (रुपीया) जो तुम किसी दास को स्वतन्त्र करने के लिए खर्च करते हो और एक दीनार (रुपीया) जो तुम किसी गरीब को दान देते हो और एक दीनार (रुपीया) जो तुम अपने घर वालो पर खर्च करते हो तो इन सब में सब से ज़्यादा पुण्य वाला वह है जो तुम अपने घर वालो पर खर्च करते हो, (सही मुस्लिम)    
(3)  पत्नी के साथ अच्छे तरीके से उत्तम व्यवहार करे,
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, " सब से पूर्ण ईमान वाला मूमिन वह है जो सब से अच्छे अख्लाक़ वाला हो, और तुम में से उत्तम वह है जो अपने पत्नी के साथ उत्तम व्यवहार करे तो महिलाओं के प्रति अल्लाह से डरते रहो, तो बेशक तुमने अल्लाह के रक्षा के माध्यम से अपने अधीन (मातहत) किया है और अल्लाह के शब्द के ज़रीए अपनी पत्नी बनाया है।" (सही मुस्लिम)
(4) खुलअ (पति को छोड़ने का अधिकार)
यदि पति और पत्नी के बीच जीवन गुज़ारने में बहुत परेशानी हो रही है और पति अपने पत्नी की जिमेदारी अदा करने की क्षमता नहीं रखता, या पति अपने पत्नी को बहुत परेशान करता है और पत्नी के सब्र करने की शक्ति खत्म हो गई तो पत्नी अपने पति के हक महर में से कुछ या पूरा वापस कर के पति को छोड़ सकती है जिसे खुलअ कहा जाता है। परन्त् महिला खुलअ उचित (धार्मकि) कारणों की वजह से लेगी। यदि बिना धार्मिक सबब के खुलअ लेने से नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मना फरमाया है। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रोगी व्यक्तियों के लिए नमाज़ पढ़ने का तरीका

शबे क़द्र

ईमान का छटा स्तम्भः भाग्य , क़िस्मत , नसीब की अच्छाई या बुराई पर विश्वास तथा ईमान है।