जीवन बहुमूल्य है जिस के सही प्रयोग से ही हमें सफलता प्राप्त होगी और हम कभी भी दुसरों के लिए गढा न खोदें, संभावना है कि कहीं हम ही न उस गढे में गिर जाए।
मंगलवार, 25 जनवरी 2011
गणतंत्र दिवस
आज 26 जनवरी ऐतिहासिक दिन है जिस दिन प्रत्येक भारतीय के हृदय में देश भक्ति की लहरें उठता है। यही वह दिन है जब जनवरी 1930 में लाहौर में पंडित जवाहर लाल नेहरु ने तिरंगा फहराया था और स्वतंत्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की घोषणा की थी।
26 जनवरी 1950 वह दिन था जब भारतीय गणतंत्र और इसका संविधान प्रभावी हुए। यही वह दिन था जब 1965 में हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया।
इस अवसर के महत्व के दर्शान के लिए हर वर्ष गणतंत्र दिवस पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, और राजधानी, नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के समीप रायसीना पहाड़ी से राजपथ पर गुजरते हुए इंडिया गेट तक और बाद में ऐतिहासिक लाल किले तक शानदार परेड का आयोजन किया जाता है।
इस लिए हम आज गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर अपने सब भारतीयों को शुभ कामनाए देते हैं और देश की प्रगति और तरक्की के लिए दुआ करते हैं। सब देशवासियों से बिन्ती करते हैं कि भारत की प्रगति, उत्पादन, तरक्की और देश की छवी को सुन्दर से अतिसुन्दर करने के लिए मिल जुल कर काम करें और उन लोगों का बाइकाट करें जो हमारे देश को बांटने का काम करते हैं और भारत की प्रगती के रास्ते में रोड़ा अटकाते है और आतंकवादी के रूप में हमारे प्रिय देश को लहुलहान करते हैं।
सफर का महीना ( अपशकुन)
इस्लामिक महीनों में से एक महिने का नाम सफर है जो केलन्डर सूची के अनुसार दुसरा महीना है। इस महीने को सफर इस लिए कहा जाता है क्यों कि इस्लाम से पहले अरब वासियों दुसरे समुदाय पर आक्रमण करते थे और सब कुछ लूट लेते और कुछ भी न छोड़ते थे, इसी लिए इस महीने को सफर कहा जाता था और अरब वासियों इस महीने में दो बड़े अप्राध में ग्रस्त थे।
पहलाः इस महीने को अपने स्वार्थ के कारण आगे – पीछे कर लेते थे।
दुसराः इस महीने को मानते थे।
इस्लाम ने पूर्व अरबवासियों के दोनों कार्यों का बहुत ज्यादा खंडन किया है और एक साफ सुथ्रा मन्त्र अल्लाह पर विश्वास पेश किया है जो हर प्रकार से पवित्र और लाभदायक है।
पहलाः इस्लाम से पहले अरब वासियों सफर के महीने को अपने स्वार्थ के कारण आगे – पीछे कर लेते थे जिस महीने को अल्लाह तआला ने आदर- सम्मान वाला बनाया था, उस में पूर्व अरबवासी उलट फेर कर देते थे। अल्लाह ने उसी उलट फेर की निति को अशुद्ध करार किया। सफर का महीना वर्ष के बारा महीने में से दुसरा महीना है। अल्लाह तआला के पास उन में से चार महीने आदर ( हुरमत वाले) हैं। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है , ” वास्तविकता यह है कि महीनों की संख्या जब से अल्लाह ने आसमान और जमीन की रचना की है, अल्लाह के लेख में बारह ही है और उन में से चार महीने आदर के (हराम) हैं, यही ठीक नियम है, अतः इन चार महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म न करो, ” ( अल- तौबाः 36 )
इसलाम से पूर्व अरबवासी इस चार महीनों के आदर ( हुरमत) को जानते थे और उस के अनुसार अमल करने का प्रयास भी करते थे परन्तु अपने आर्थिक स्वाद के लिए मुहर्रम महीने को सफर महीने से बदल देते थे और कभी सफर के स्थान पर मुहर्रम महीने से परिवर्तन कर देते थे। अल्लाह तआला ने मुश्रिकीन (इसलाम से पूर्व अरब वासी) के इसी निति का खंडण किया है और खुले शब्दों में मानव को आदेश दे दिया कि तुम इस महीनों में उलट फेर करके अपने ऊपर अत्याचार न करो, अल्लाह तआला ने जो नियम बना दिया है उस में संशोधन नही हो सकता यदि जो संशोधन करने का प्रयास करेगा वह अपने ऊपर ज़ुल्म करेगा। यदि कोइ मानव महीने की उलट फेर करता है तो उसे कोइ लाभ तो न होगा बल्कि वास्तविक घाटा उठाएगा।
दुसरी बड़ी खलती जो पूर्व अरब वासी इस महीने में करते थे कि वह लोग सफर महीने को अपशकुन मानते थे। बल्कि आज के भी बहुत से लोग सफर के महीने को अपशकुन मानते हैं और बहुत सा वह काम करते हैं जो शिर्क के सूची में आता है। अपशकुन कहते हैं ” कोइ व्यक्ति किसी काम करने जा रहा हो और उसी समय बिल्ली रास्ता काट दे, या किसी नापसन्द व्यक्ति को देख ले, या शीशा गिर कर टूट जाए तो अपशकुन माना जाए कि अब हमारा यह काम न होगा और उस काम को न किया जाए।
अल्लाह तआला के आज्ञा के अनुसार हर वस्तु अपने अन्जाम को पहुंचती है। किसी भी मख्लूक (वस्तु) के पास उस चीज को रोकने की शक्ति नही, यदि कोइ व्यक्ति शक्ति उस चीज में मान कर वह काम नही करता तो उसने अल्लाह तआला से विश्वास हटा कर बन्दों को लाभ या हाणी का मालिक मानता है तो यही शिर्क है। प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस अपशकुन से खुले शब्दों में मना फरमाया है
” عن أبي هريرة قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : ” لا عدوى ولا طيرة ولا هامَة ولا صَفَر وفر من المجذوم كما تفر من الأسد ” رواه البخاري
अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” छूत वाला रोग स्वयं नही लगता, और न ही अपशकुन होता, और न उल्लू के बोलने कोई फरक पड़ा, और न ही सफर महीने का असर है और तुम कोढ़ी से वेसे भागो जेसे शेर से भागते हो ” ( सही बुकारी)
उक़बा बिन आमिर (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सामने शुभ शकुन का जिकर आया तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” शुभ शकुन अच्छी चीज़ है और मुसलमान को अपशकुन किसी काम से नही रोकती, जब तुम में से कोइ अप्रिय चीज़ देखे तो कहे, ऐ अल्लाह ! तेरे सिवा कोई भलाई लाने वाला नही, और न ही तेरे सिवा कोई बुराई दूर कर सकता है और न ही तेरे सिवा किसी को शक्ति तथा ताकत है ” ( अबी दाऊद )
अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” अपशकुन शिर्क है, अपशकुन शिर्क है, (अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद (रज़ी अल्लाह अन्हु) कहते है) , हम में से प्रत्येक व्यक्ति के जहन में इस प्रकार क चिन्ता आता है परन्तु अल्लाह पर विश्वास और भरोसा से यह चीज समाप्त होजाती है ” ( सुनन अबी दाऊद व सुनन तिर्मिजी)
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” जिसे अपशकुन ने किसी काम से रोक दिया तो उसने शिर्क किया।…. ( मुस्नद अहमद )
इसी तरह किसी महीला से अपशकुन लेना या पक्षी से अपशकुन लेना भी शिर्क के सुची में आएगा क्यों इन चीजों में कुछ भी शक्ति नही कि किसी को लाभ या नुक्सान पहुंचाए। फायदे या लाभ का वास्तविक मालिक एल्लाह तआला है। अल्लाह जिसे चाहे लाभ पहुंचाए और जिसे चाहे नुक्सान पहुंचाए फिर हम अपने जैसे किसी मख्लूक को उस चीज़ का दोषी क्यों ठहराए जिसा का वह मालिक नही।
सोमवार, 10 जनवरी 2011
मुस्लिम का व्यवहार
इस्लामिक जीवन में अच्छे आचार तथा व्यवहार बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसी कारण इस्लाम ने अच्छे आचरण और स्वभाव व्यक्तियों को उच्च स्थान पर स्थापित किया है। उत्तम व्यवहार एवं सुन्दर आचार एक आदर्श समाज की निर्माण के लिए ईंट का काम करती है और सुन्दर संस्कृति की निर्माण के लिए ठोस नीव है। अच्छे व्यवहार की ओर सर्व नबियों, रसूलों ने आमंत्रण किया है।
इस लिए इस्लाम ने अपने अनुयायियों को प्रत्येक उत्तम व्यवहार और स्वभाव का शिक्षण दिया और अशुद्ध आचार से दूर रहने का आदेश दिया। यही कारण कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने खुले शब्दों में कह दिया कि मेरे नबी बना कर भेजे जाने का लक्ष्य ही उत्तम आचार का प्रचार करना है। मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है, " انما بعثت لأتمم مكارم الأخلاق "
निःसंदेह मुझे केवल इसी लिए भेजा गया कि मैं उत्तम आचार की ओर बुलाता रहूँ " ( मुस्नद अहमद )
जब मानव का आचार अच्छा होगा तो उसका ईमान भी सम्पूर्ण होगा और उस के जन्नत में प्रवेश होने की संभावना भी अधिक होगी जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है,
وعن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ": أكمل المومنين ايماناأحسنهم خلقا و خياركم خياركم لنسائهم خلقا " - أخرجه أحمد والترمذي
अर्थातः अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " सब से सम्पूर्ण और सर्वश्रेष्ट मुस्लिम वह है जो व्यवहार के अनुसार सब से अच्छा हो, और तुम में से उत्तम वह है जो अपनी पत्नियों के साथ अच्छा व्यवहार करे "।
इसी प्रकार जो लोग अच्छे व्यवहार के साथ जीवन गुज़ारते हैं और उत्तम आचार के साथ लोगों से मिलते जुलते हैं, लोगों को किसी प्रकार की तकलीफ नही देते, तो ऐसा व्यक्ति क़ियामत के दिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के निकट्तम होंगे जैसा कि जाबिर बिन अब्दुल्लाह से वर्नण है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया
إن من أحبكم إليّ و أقربكم مني مجلسا يوم القيامة أحاسنكم أخلاقا " - أخرجه الترمذي وحسّنه"
मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथी जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ी अल्लाह अन्हु) कहते है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " निःसंदेह तुम मेरे पास ज्यादा प्रिय और बैठक के अनुसार ज्यादा नज्दीक होंगे जो अच्छे और उत्तम आचार वाले होंगे "
उत्तम आचार , उम्दा मेल-जोल, मीठे बोल-चाल के माध्यम से एक मूमीन हमेशा रोज़ा रखने वाले, हमेशा नमाज़ पढ़ने वाले के पद को पा सकता है। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है "
وعن عائشة رضي الله عنها قالت سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول " إن المؤمن ليدرك بحسن خلقه درجة الصائم والقائم " - أخرجه ابوداؤد والحاكم
इस हदीस का अर्थातः बेशक मूमीन अपने अच्छे आचरण और शुद्ध व्यवहार से हमेशा रोज़ा रखने वाले, हमेशा नमाज़ पढ़ने वाले के स्थान को पा सकता है।
इसी तरह क़ियामत के दिन तराज़ू में सब से भारी चीज़ अच्छा आचार उत्तम चरित्र ही होगा। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है "
وعن أبي الدرداء رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال " ما من شيئ أثقل في ميزان العبد المؤمن يوم القيامة من حسن الخلق وان الله يبغض الفاحش البذي " - أخرجه الترمذي
इस हदीस का अर्थातः अबू दरदा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है " मूमीन बन्दों के तराज़ू में क़ियामत के दिन सब से भारी चीज़ अच्छे अख्लाक होंगे और अल्लाह तआला बद खुलुक दुराचार तथा दुर्व्यवहार वाले से घृणा करते हैं।"
अल्लाह तआला भी उन लोगों से प्रेम करता है जो अच्छे चरित्र वाले होते हैं, और अल्लाह की ओर से मानव को सब से उत्तम चीज़ वर्दान की जाती है वह अच्छे व्यवहार , सुन्दर आचार और बेह्तरीन चरित्र है। जैसा कि हदीस में आया है।
قالوا : يا رسول الله ! ما خير ما اعطي الإنسان ؟ قال " الخلق الحسن " - صحّحه الألباني
लोगों ने प्रश्न किया. ऐ अल्लाह के रसूल! लोगों को सब से अच्छी चीज़ कौन सी वर्दान की जाती है तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उत्तर दिया। अच्छे व्यवहार "
जो लोग अच्छे चरित्र वाले होते हैं, स्वभाव को अपनी जीवन का अटूट हिस्सा बना लेते हैं, लोगों के प्रति उसका हृदय नरम होता है, अच्छे व्यवहार से मिलते जुलते हैं तो ऐसे लोगों के लिए जन्नत (स्वर्ग) की गारेन्टी मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने लिया है
وعن أبي أمامة الباهلي رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:" أنا زعيم ببيت في ربض الجنة لمن ترك المراء وإن كان محقا ، وببيت في وسط الجنة لمن ترك الكذب وإن كان مازحا ، وببيت في أعلى الجنة لمن حسن خلق " - الترغيب والترهيب للمنذري
इस हदीस का मत्लब यह है, अबु उमामा बाहली (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " मैं उस व्यक्ति के लिए जन्नत (स्वर्ग) के निच्ले हिस्से की जिम्मेदारी लेता हूँ जो हक्दार होने के बावजूद झग्ड़ा लड़ाइ छोड़ दे, और मैं उस व्यक्ति के लिए जन्नत (स्वर्ग) के बीचवाले हिस्से की जिम्मेदारी लेता हूँ जो हंसी-मज़ाक में भी झूट बोलना छोड़ दे, और मैं उस व्यक्ति के लिए जन्नत (स्वर्ग) के उच्च स्थान की जिम्मेदारी लेता हूँ जिसका चरित्र, व्यवहार, स्वभाव अच्छा होजाए,
सुब्हानल्लाह, कितना बड़ा स्थान और किया ही शुभ सूची है उन व्यक्तियों के लिए जो उत्तम व्यवहार, सुन्दर आचार , अच्छे अख्लाक़, और उम्दा चरित्र वाले होते हैं। यही कारण है कि संसारिक जीवन और पारलौकिक जीवन की सफलता केवल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आदर्शनीय जीवन के अनुसार जीवन बिताने पर निर्भर करता है। जीवन के हर मोड़ पर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अपना आदर्श माना जाए, क्यों कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अमल कर के कुरआन का व्याख्या किया है, अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के महामहानतम अख्लाक को बयान किया,
وإنّك لعلى خلق عظيم " - القلم : 4"
इस आयत का अर्थातः और बैशक आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अख्लाक़ के बड़े मरतबे पर हो,
प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अख्लाक़ के प्रति आईशा (रज़ी अल्लाह अन्हा) से प्रश्न किया गया तो आईशा (रज़ी अल्लाह अन्हा) ने उत्तर दिया कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का अख्लाक ही कुरआन था।
इतने उच्च आचार और उत्तम व्यवहार के मालिक होने के बावजूद आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह से प्रार्थना करते थे कि मेरे अख्लाक को उत्तम से उत्तम कर दे
عن عبدالله بن مسعود رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول: " اللهم أحسنت خلقي فأحسن خلقي " - مسند أحمد
इस हदीस का माना यह है, अबदुल्लाह बिन मस्ऊद (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह से हमेशा दुआ मांगते थे " ऐ अल्लाह ! जिस तरह तूने मेरी बनावट को अति सुन्दर बनाया है उसी तरह मेरे आचार , व्यवहार को अति सुन्दर कर दे,
अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में खुले शब्दों में मानव को आदेश दे दिया कि यदि तुम अल्लाह और अन्तिम दिन पर विश्वास और ईमान रखते हो तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अनुसार जीवन गुज़ारो, और इसी में तुम्हारी सफलता है। अल्लाह का कथन है।
لقد كان لكم في رسول الله أسوة حسنة لمن كان يرجو الله و اليوم الآخر وذكرالله كثيرا" -الأحزاب: 21"
वास्तव में तुम लोगों के लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अन्तिम दिन की आशा रखता है और अल्लाह को ज़्यादा याद रखता है।
प्रिय मित्रो, अच्छे आचार , सुन्दर स्वभाव केवल पढ़ने – लिखने की चीज़ नही और न ही कहानिया है जिसे केवल बयान किया जाए और ईच्छाए हैं जिस की कल्पना की जाए बल्कि यह अल्लाह पर विश्वास तथा ईमान से प्राप्त होता है , अल्लाह पर ईमान पेड़ है तो अच्छा अख्लाक़ उसका फल, यदि ईमान बिल्डिंग की नीव है तो अच्छे अख्लाक़ उसकी इमारत, जब भी अख्लाक, व्यवहार , आचार अच्छा होगा, ईमान ज़्यादा होगा और अख्लाक बिग्ड़ेगा , आचार अशुद्ध होगा तो ईमान कमज़ोर होगा,
इसी लिए एक मुस्लिम की परिभाषा यह की गइ है जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है ,
المسلم من سلم المسلمون من لسانه ويده " - أخرجه : الترمذي"
मुसलमान वह है जिस के हाथ तथा ज़ुबान के शड़यंत्र से दुसरे मुसलमान सुरक्षित रहे,
एक व्यक्ति उसी समय जन्नत का मुस्तहिक़ होगा जब उसका आचरण, व्यवहार, स्वभाव अतिसुन्दर हो और उस के पड़ोसी उस से प्रसन्न हो, यदि किसी व्यक्ति का व्यवहार तथा चरित्र सुन्दर न होगा, वह अपने पड़ोसियों को परीशान करता हो, उसके पड़ोसी उस से अप्रसन्न हो तो ऐसा व्यक्ति जहन्नम (नरक) में जाऐगा जैसा कि अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से एक व्यक्ति ने प्रश्न किया कि ऐ अल्लाह के रसूल ! फलाँ महिला बहुत नमाज़ पढ़ती, बहुत रोज़ा रखती और बहुत ज़्यादा दान करती परन्तु उस के पड़ोसी उस महिला से बहुत परीशान हैं। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " वह जहन्नम (नरक) में जाऐगी, तो फिर उस व्यक्ति ने प्रश्न किया कि ऐ अल्लाह के रसूल ! फलाँ महिला केवल फर्ज़ (अनिवार्य़) नमाज़ पढ़ती, केवल फर्ज़ (अनिवार्य़) रोज़ा रखती और केवल फर्ज़ (अनिवार्य़) दान देती परन्तु उस के पड़ोसी उस महिला से बहुत ज़्यादा प्रसन्न हैं। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " वह जन्नत में जाऐगी,
गोया कि अच्छे अखलाक़, स्वभाव तथा उत्तम आचार के कारण ही हम अपने पारलोकिक जीवन को सफलपूर्वक बना सकते हैं और दूर्व्यवहार, अशुद्ध आचार के कारण हम अपने पारलोकिक जीवन को नष्ठ कर सकते हैं। निर्णय तथा कर्म करना हमारे हाथ में है।
रविवार, 5 दिसंबर 2010
माहे मोहर्रम की वास्तविकता
सम्पूर्ण परशंसा अल्लाह के योग्य है और मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर अनगिनित दरूदु सलाम हो, अल्लाह तआला का अपने दासों पर बहुत बड़ा कृपा है कि उसने बन्दों के झोली को पुण्य से भरने के लिए विभिन्न समय , महीने तथा तरीके उतपन्न किये, उन में से एक मोहर्रम का महीना है ।
मोहर्रम के महीने की सर्वशेष्टा निम्नलिखित वाक्यों से प्रमाणित होता है।
माहे मोहर्रम में रक्तपात, किसी पर अत्याचार करने का पाप दुग्ना हो जाता है।
जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है। " वास्तविकता यह है कि महीनों की संख्या जब से अल्लाह ने आकाश और धरती की रचना की है, अल्लाह के लेख में बारह ही है और उन में से चार महीने आदर के (हराम) हैं। यही ठीक नियम है, अतः इन चार महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म (अत्याचार) न करो " ( सूरः तौबा , 36)
अबू बकरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने हज के भाषण में फरमाया " निःसंदेह समय चक्कर लगा कर अपनी असली हालत में लौट आया है जिस दिन अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की रचना किया। वर्ष में बारा महीने होते हैं। उन में से चार आदर के (हराम) महीने हैं। तीन महीने मुसलसल हैं, जूल कादा, जूल हिज्जा, मोहर्रम और रजब है।" ( सही बुखारी और सही मुस्लिम)
अबू ज़र (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रश्न किया कि रात का कौन सा भाग अच्छा है और कौन सा महीना सर्वशेष्टा है ? तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया। रात का अन्तिम भाग अच्छा है और मोहर्रम का महीना सर्वशेष्टा है।" ( सुनन नसई)
रमज़ान महीने बाद के मोहर्रम का महीना बेहतरीन है जैसा की एक हदीस से इस बात की पुष्ठी करण होता है। अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया " सब से अच्छा रोज़ा रमज़ान के बाद अल्लाह के महीने मोहर्रम का रोज़ा है और फर्ज़ नमाज़ के बाद सर्वशेष्ट नमाज़ रात की नमाज़ है।" ( सही मुस्लिम )
मोहर्रम के रोज़ा रखने का कारण
रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस मोहर्रम के रोज़ा रखने का कारण भी बता दिया है। जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब मदीना हिज्रत कर के तशरीफ लाए तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पाया कि यहूद रोज़ा रखते हैं। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने प्रश्न किया, तुम लोग किस कारण आशूरा (10 मोहर्रम) के दिन रोज़ा रखते हो ? तो उन लोगों ने उत्तर दिया, यह एक महान दिन है जिस में अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्साम) और उन की समुदाय को फिरऔन से मुक्ति दी और फिरऔन और उस की समुदाय को डुबा दिया। तो मूसा (अलैहिस्साम) ने अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए रोज़ा रखा। तो हम लोग भी इसी दिन रोज़ा रखते हैं। तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा " हम तुम लोगों से अधिक मूसा (अलैहिस्साम) के निकटतम और हक्दार हैं और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रोज़ा रखा और इस रोज़े के रखने का आदेश दिया।" ( सही बुखारी और सही मुस्लिम)
मोहर्रम के रोज़े की फज़ीलत
मोहर्रम के 10 वे दिन की एहमीयत बहुत ज़्यादा है और मूसा (अलैहिस्साम) ने रोज़ा रखा और उन के अनुयायियों ने भी रोज़ा रखा यहाँतक कि कुरैश (इस्लाम से पहले के अरब वासी) ने रोज़ा रखा और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रोज़ा रखा और लोगों को इस रोज़े के रखने पर उत्साहित किया। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन है जिसे अबू क़ताता (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि एक व्यक्ति ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से आशूरा के रोज़े के प्रति प्रश्न क्या ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया।" मैं अल्लाह से आशा करता हूँ कि एक वर्ष के पापों के मिटा देगा " ( सही मुस्लिम)
यह अल्लाह तआला का बहुत बड़ा कृपा हम पर है कि एक दिन के रोज़े के बदले एक वर्ष के पाप स्माप्त हो जाते हैं। प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 10 मोहर्रम के रोज़े का खास ध्यान रखते थे। जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को आशूरा के दिन का रोज़ा रखने का बहुत ख्याल करते हुए पाया और रमज़ान के रोज़े का ऐहतमाम करते हुए देखा । ( सही बुखारी)
आशूरा का रोज़ा किस किस तिथि को रखा जाए ?
(1) मोहर्रम की 9 और 10 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " यदि मैं आने वाले वर्ष तक जीवित रहा तो 9 और 10 का रोज़ा रखूंगा " ( सही मुस्लिम)
(2) मोहर्रम की 10 और 11 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " यहूद की मुखाल्फत करो, 10 के साथ एक दिन पहले ( 9 तिथि) या एक दिन बाद (11) को रोज़ा रखो, ( मुस्नद अहमद और इब्ने खुज़ैमा )
(3) मोहर्रम की 9 , 10 और 11 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " 10 के साथ एक दिन पहले ( 9 तिथि) और एक दिन बाद (11) को रोज़ा रखो,
मोहर्रम के महीने की सर्वशेष्टा निम्नलिखित वाक्यों से प्रमाणित होता है।
माहे मोहर्रम में रक्तपात, किसी पर अत्याचार करने का पाप दुग्ना हो जाता है।
जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है। " वास्तविकता यह है कि महीनों की संख्या जब से अल्लाह ने आकाश और धरती की रचना की है, अल्लाह के लेख में बारह ही है और उन में से चार महीने आदर के (हराम) हैं। यही ठीक नियम है, अतः इन चार महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म (अत्याचार) न करो " ( सूरः तौबा , 36)
अबू बकरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने हज के भाषण में फरमाया " निःसंदेह समय चक्कर लगा कर अपनी असली हालत में लौट आया है जिस दिन अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की रचना किया। वर्ष में बारा महीने होते हैं। उन में से चार आदर के (हराम) महीने हैं। तीन महीने मुसलसल हैं, जूल कादा, जूल हिज्जा, मोहर्रम और रजब है।" ( सही बुखारी और सही मुस्लिम)
अबू ज़र (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रश्न किया कि रात का कौन सा भाग अच्छा है और कौन सा महीना सर्वशेष्टा है ? तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया। रात का अन्तिम भाग अच्छा है और मोहर्रम का महीना सर्वशेष्टा है।" ( सुनन नसई)
रमज़ान महीने बाद के मोहर्रम का महीना बेहतरीन है जैसा की एक हदीस से इस बात की पुष्ठी करण होता है। अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया " सब से अच्छा रोज़ा रमज़ान के बाद अल्लाह के महीने मोहर्रम का रोज़ा है और फर्ज़ नमाज़ के बाद सर्वशेष्ट नमाज़ रात की नमाज़ है।" ( सही मुस्लिम )
मोहर्रम के रोज़ा रखने का कारण
रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस मोहर्रम के रोज़ा रखने का कारण भी बता दिया है। जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब मदीना हिज्रत कर के तशरीफ लाए तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पाया कि यहूद रोज़ा रखते हैं। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने प्रश्न किया, तुम लोग किस कारण आशूरा (10 मोहर्रम) के दिन रोज़ा रखते हो ? तो उन लोगों ने उत्तर दिया, यह एक महान दिन है जिस में अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्साम) और उन की समुदाय को फिरऔन से मुक्ति दी और फिरऔन और उस की समुदाय को डुबा दिया। तो मूसा (अलैहिस्साम) ने अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए रोज़ा रखा। तो हम लोग भी इसी दिन रोज़ा रखते हैं। तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा " हम तुम लोगों से अधिक मूसा (अलैहिस्साम) के निकटतम और हक्दार हैं और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रोज़ा रखा और इस रोज़े के रखने का आदेश दिया।" ( सही बुखारी और सही मुस्लिम)
मोहर्रम के रोज़े की फज़ीलत
मोहर्रम के 10 वे दिन की एहमीयत बहुत ज़्यादा है और मूसा (अलैहिस्साम) ने रोज़ा रखा और उन के अनुयायियों ने भी रोज़ा रखा यहाँतक कि कुरैश (इस्लाम से पहले के अरब वासी) ने रोज़ा रखा और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रोज़ा रखा और लोगों को इस रोज़े के रखने पर उत्साहित किया। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन है जिसे अबू क़ताता (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि एक व्यक्ति ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से आशूरा के रोज़े के प्रति प्रश्न क्या ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया।" मैं अल्लाह से आशा करता हूँ कि एक वर्ष के पापों के मिटा देगा " ( सही मुस्लिम)
यह अल्लाह तआला का बहुत बड़ा कृपा हम पर है कि एक दिन के रोज़े के बदले एक वर्ष के पाप स्माप्त हो जाते हैं। प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 10 मोहर्रम के रोज़े का खास ध्यान रखते थे। जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को आशूरा के दिन का रोज़ा रखने का बहुत ख्याल करते हुए पाया और रमज़ान के रोज़े का ऐहतमाम करते हुए देखा । ( सही बुखारी)
आशूरा का रोज़ा किस किस तिथि को रखा जाए ?
(1) मोहर्रम की 9 और 10 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " यदि मैं आने वाले वर्ष तक जीवित रहा तो 9 और 10 का रोज़ा रखूंगा " ( सही मुस्लिम)
(2) मोहर्रम की 10 और 11 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " यहूद की मुखाल्फत करो, 10 के साथ एक दिन पहले ( 9 तिथि) या एक दिन बाद (11) को रोज़ा रखो, ( मुस्नद अहमद और इब्ने खुज़ैमा )
(3) मोहर्रम की 9 , 10 और 11 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " 10 के साथ एक दिन पहले ( 9 तिथि) और एक दिन बाद (11) को रोज़ा रखो,
बुधवार, 1 सितंबर 2010
शबे क़द्र

रमज़ान महीने में एक रात ऐसी भी आती है जो हज़ार महीने की रात से बेहतर है जिसे शबे क़द्र कहा जाता है। शबे क़द्र का अर्थ होता है " सर्वशेष्ट रात " ऊंचे स्थान वाली रात " लोगों के नसीब लिखी जानी वाली रात,
शबे क़द्र बहुत ही महत्वपूर्ण रात है जिस के एक रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादतों से बेहतर और अच्छा है। इसी लिए इस रात की फज़ीलत कुरआन मजीद और प्रिय रसूल मोहम्मद( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीसों से प्रमाणित है।
निम्नलिखित महत्वपूर्ण वाक्यों से क़द्र वाली रात की अहमियत मालूम होती है।
(1) इस पवित्र रात में अल्लाह तआला ने कुरआन करीम को लोह़ महफूज़ से आकाश दुनिया पर उतारा फिर 23 वर्ष की अविधि में अवयशक्ता के अनुसार मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर उतारा गया। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " हम्ने इस (कुरआन) को कद्र वाली रात में अवतरित किया है।.. " (सुराः कद्र)
(2) यह रात अल्लाह तआला के पास बहुत उच्च स्थान रखता है।
इसी लिए अल्लाह तआला ने प्रश्न के तरीके से इस रात की महत्वपूर्णता बयान फरमाया है और फिर अल्लाह तआला स्वयं ही इस रात की फज़ीलत को बयान फरमाया कि यह एक रात हज़ार महीनों की रात से उत्तम है। " और तुम किया जानो कि कद्र की रात क्या है ? क़द्र की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है।" (सुराः कद्र)
(3) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से अन्गीनित फरिश्ते और जिबरील आकाश से उतरते है। अल्लाह तआला की रहमतें, अल्लाह की क्षमा ले कर उतरते हैं, इस से भी इस रात की महत्वपूर्णता मालूम होती है। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " फ़रिश्ते और रूह उस में अपने रब की अनुज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं। " (सुराः कद्र)
(4) यह रात बहुत सलामती वाली है। इस रात में अल्लाह की इबादत में ग्रस्त व्यक्ति परेशानियों, ईश्वरीय संकट से सुरक्षित रहते हैं। इस रात की महत्वपूर्ण, विशेष्ता के बारे में अल्लह तआला ने कुरआन करीम में बयान फरमाया है। " यह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। " (सुराः कद्र)
(5) यह रात बहुत ही पवित्र तथा बरकत वाली है, इस लिए इस रात में अल्लाह की इबादत की जाए, ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह से दुआ की जाए, अल्लाह का फरमान है। " हम्ने इस (कुरआन) को बरकत वाली रात में अवतरित किया है।...... " (सुराः अद् दुखान)
(6) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से लोगों के नसीबों (भाग्य) को एक वर्ष के लिए दोबारा लिखा जाता है। इस वर्ष किन लोगों को अल्लाह तआला की रहमतें मिलेंगी? यह वर्ष अल्लाह की क्षमा का लाभ कौन लोग उठाएंगे? इस वर्ष कौन लोग अभागी होंगे? किस को इस वर्ष संतान जन्म लेगा और किस की मृत्यु होगी? तो जो व्यक्ति इस रात को इबादतों में बिताएगा, अल्लाह से दुआ और प्राथनाओं में गुज़ारेगा, बेशक उस के लिए यह रात बहुत महत्वपूर्ण होगी। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " यह वह रात है जिस में हर मामले का तत्तवदर्शितायुक्त निर्णय हमारे आदेश से प्रचलित किया जाता है। " (सुराः अद् दुखानः5 )
(7) यह रात पापों , गुनाहों, गलतियों से मुक्ति और छुटकारे की रात है।
मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। खास कर इस रात में लम्बी लम्बी नमाज़े पढ़ा जाए, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों, गलतियों पर माफी मांगा जाए, अल्लाह तआला बहुत माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है। " जो व्यक्ति शबे क़द्र में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे" ( बुखारी तथा मुस्लिम)
यह महान क़द्र की रात कौन सी है ?
यह एक ईश्वरीय प्रदान रात है जिस की महानता के बारे में कुछ बातें बयान की जा चुकी हैं। इसी शबे क़द्र को तलाशने का आदेश प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने कथन से दिया है। " जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि " रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक रातों में तलाशों " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
एक हदीस में रमज़ान करीम की चौबीसवीं रात में शबे क़द्र को तलाशने का आज्ञा दिया गया है। और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस मुबारक रात की कुछ निशानियाँ बताया है। जिस के अनुसार वह रात एकीस रमज़ान की रात थीं जैसा कि प्रिय रसूल के साथी अबू सईद अल खुद्री (रज़ी अल्लाहु अन्हु) वर्णन करते हैं। प्रिय रसूल के दुसरे साथी अब्दुल्लाह बिन अनीस (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात तेईस रमज़ान की रात थीं और अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) तथा उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात सत्ताईस रमज़ान की रात थीं और उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) तो कसम खाया करते थे कि शबे क़द्र सत्ताईस रमज़ान की रात है, तो उन के शागिर्द ने प्रश्न किया कि किस कारण इसी रात को कहते हैं? तो उन्हों ने उत्तर दिया, निशानियों के कारण, प्रिय रसूल मोहम्मद (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने भी शबे क़द्र को अन्तिम दस ताक वाली(21,23,25,27,29) रातों में तलाश ने का आदेश दिया है। शबे क़द्र के बारे में जितनी भी हदीस की रिवायतें आइ हैं। सब सही बुखारी, सही मुस्लिम और सही सनद से वारिद हैं। इस लिए हदीस के विद्ववानों ने कहा है कि सब हदीसों को पढ़ने के बाद मालूम होता है कि शबे क़द्र हर वर्ष विभिन्न रातों में आती हैं। कभी 21 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 23 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 25 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 27 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 29 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती और यही बात सही मालूम होता है। इस लिए हम इन पाँच बेजोड़ वाली रातों में शबे क़द्र को तलाशें और बेशुमार अज्रो सवाब के ह़क़्दार बन जाए।
शबे क़द्र की निशानीः
प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस रात की कुछ निशानी बयान फरमाया है जिस के माध्यम से इस महत्वपूर्ण रात को पहचाना जा सकता है।
(1) यह रात बहूत रोशनी वाली होगी, आकाश प्रकाशित होगा , इस रात में न तो बहुत गरमी होगी और न ही सर्दी होगी बल्कि वातावरण अच्छा होगा, उचित होगा। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने निशानी बताया है जिसे सहाबी वासिला बिन अस्क़अ वर्णन करते है कि रसूल ने फरमाया " शबे क़द्र रोशनी वाली रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और वातावरण संतुलित होता है और सितारे को शैतान के पीछे नही भेजा जाता।" ( तब्रानी )
(2) यह रात बहुत संतुलित वाली रात होगी। वातावरण बहुत अच्छा होगा, न ही गर्मी और न ही ठंडी होगी। हदीस रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इसी बात को स्पष्ट करती है " शबे क़द्र वातावरण संतुलित रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो लालपन धिमा होता है।" ( सही- इब्नि खुज़ेमा तथा मुस्नद त़यालसी )
(3) शबे क़द्र के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी धिमी होती है, सुर्य के रोशनी में किरण न होता है । जैसा कि उबइ बिन कअब वर्णन करते हैं कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी में किरण न होता है।" ( सही मुस्लिम )
हक़ीक़त तो यह है कि इन्सान इन रातों की निशानियों का परिचय कर पाए या न कर पाए बस वह अल्लाह की इबादतों, ज़िक्रो- अज़्कार, दुआ और कुरआन की तिलावत,कुरआन पर गम्भीरता से विचार किरे । इख्लास के साथ, केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए अच्छे तरीक़े से अल्लाह की इबादत करे, प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इताअत करे, और अपनी क्षमता के अनुसार अल्लाह की खूब इबादत करे और शबे क़द्र में यह दुआ अधिक से अधिक करे, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों , गलतियों पर माफी मांगे जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि, मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न क्या कि यदि मैं क़द्र की रात को पालूँ तो क्या दुआ करू तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " अल्लाहुम्मा इन्नक अफुव्वुन करीमुन, तू हिब्बुल-अफ्व,फअफु अन्नी" अर्थात: ऐ अल्लाह ! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तो मेरे गुनाहों को माफ कर दे।"
अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे। आमीन............
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
रमज़ान के महीने के में की जाने वाली इबादतें- अराधना

रमज़ान करीम की बरकत और पवितर्ता से हम उसी समय लाभ उठा सकते हैं जब हम अपने बहुमूल्य समय का सही प्रयोग करेंगे, इस कृपा, माफी वाले महिने में सही से अल्लाह तआला की पुजा- अराधना करेंगे जिस तरह से प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अल्लाह तआला की पुजा- अराधना किया है। वह इबादतें करेंगे जिसके करने से हमें पुण्य प्राप्त हो और हमारी झोली पुण्य से भर जाए और हमारा दामन पापों से पाक साफ हो जाए और उन कामों से दुर रहा जाए जो इस पवित्र महीने की बरकत तथा अल्लाह की कृपा, माफी से हमें महरूम ( वंचित) कर दे।
रमज़ान के महिने की सब से महत्वपूर्ण इबादत रोज़ा (ब्रत) है जिसे उसकी वास्तविक हालत से रखा जाए और उन कामों तथा कार्यों से दूर रहा जाए जो रोज़े को भंग ( खराब) कर दे। रोज़े रखने के लिए सब से पहले रात से ही या सुबह सादिक़ से पहले ही रोज़े रखने की नीयत किया जाए। इस लिए कि जो व्यक्ति रात में ही रोज़े की नीयत न करेगा, उस का रोज़ा पूर्ण न होगा। मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है " जो व्यक्ति रात ही से रोज़े की नीयत न करे, उस का रोज़ा नही। " ( अल- मुहल्लाः इब्नि हज़्म, अल-इस्तिज़्कारः इब्नि अब्दुल्बिर)
रमज़ान के मुबारक महीने में निम्नलिखित कार्य अल्लाह को खुश करने के लिए किया जाए।
1- सेहरीः
रोज़े रखने के लिए सब से पहले सेहरी खाया जाए क्यों कि सेहरी खाने में बरकत है, सेहरी कहते हैं सुबह सादिक़ से पहले जो कुछ उप्लब्ध हो उसे रोज़ा रखने की नीयत से खा लिया जाए। रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया," सेहरी खाओ क्यों कि सेहरी खाने में बरकत है "। एक दुसरी हदीस में आया है " सेहरी खाओ यदि एक घोंट पानी ही पी लो, "
2 - फजर की नमाज़ के बाद से सुर्य निकलने तक मस्जिद में बैठ कर ज़िक्र – अज़्कार करनाः
यदि कोई व्यक्ति फजर की नमाज़ के बाद से सुर्य निकलने तक मस्जिद में बैठ कर ज़िक्रो अज़्कार करता है तो उसे बहुत ज़्यादा पुण्य मिलता है। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " जिस ने फजर की नमाज़ पढ़ा और अपने स्थान पर बैठे ज़िक्रो अज़्कार करता रहा फिर सुर्य निक्ला और उसने दो रकआत नमाज़ पढ़ा तो उसे एक उमरे का पुरा पुरा सवाब (पुण्य) प्राप्त होगा, ( सुनन तिर्मिज़ी)
3 - रोज़े की हालत में गलत सोच – विचार से अपने आप को सुरक्षित रखा जाएः
फजर से पहले से लेकर सुर्य के डुबने तक खाने – पीने तथा संभोग से रुके रहना ही रोज़ा की वास्तविक्ता नही बल्कि रोज़ा की असल हक़ीक़त यह कि मानव हर तरह की बुराई, झूट, झगड़ा लड़ाइ, गाली गुलूच, तथा गलत व्यवहार और गलत सोच – विचार तथा अवैध चीज़ो से अपने आप को रोके रखना ही रोज़े का लक्ष्य है और उसे पुण्य उसी समय प्राप्त होगा जब वह इसी तरह रोज़े रखेगा, जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है " जो व्यक्ति अवैध काम और झूट और झूटी गवाही तथा जहालत से दूर न रहे तो अल्लाह को कोई अवशक्ता नही कि वह भूका, पीयासा रहे " ( बुखारी )
यदि कोई व्यक्ति रोज़ेदार व्यक्ति से लड़ाइ झगड़ा करने की कोशिश करे तो वह लड़ाइ, झगड़ा न करे बल्कि स्थिर से कहे कि मैं रोज़े से हूँ, जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है " जब तुम में कोइ रोज़े की हालत में हो तो आपत्तिजनक बात न करे, जोर से न चीखे चिल्लाए, यदि कोइ उसे बुरा भला कहे या गाली गुलूच करे तो वह उत्तर दे, मैं रोज़े से हूँ।" ( बुखारी तथा मुस्लिम)
रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है " कितने ही रोज़ेदार एसे हैं जिन के रोज़े से कोई लाभ नही, केवल भुखा और पियासा रहना है। " ( मिश्कातुल मसाबीह )
गोया कि रमज़ान महिने में अल्लाह तआला की ओर से दी जाने वाली माफी, अच्छे कामों से प्राप्त होनी वाली नेकियाँ, उसी समय हम हासिल कर सकते हैं जब हम रोज़े की असल हक़कीत के साथ रोज़े रखेंगे ।
4 - कुरआन करीम की ज़्यादा से ज़्यादा तिलावत किया जाएः
अल्लाह तआला ने पवित्र कुरआन इस मुबारक महीने में मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर फरिश्ते जिब्रील के माध्यम से उतारा, जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है, " रमज़ान वह महीना है जिस में कुरआन उतारा गया जो इनसानों के लिए सर्वथा मार्गदर्शन है और ऐसी स्पष्ट शिक्षाओं पर आधारित है जो सीधा मार्ग दिखानेवाली और सत्य और असत्य का अन्तर खोलकर रख देने वाली है। " ( सूरः बक़रा,185)
यही वजह है कि फरिश्ते जिब्रील हर रमज़ान के महीने में मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को कुरआन का दौरा कराते थे। इस्लामिक विद्ववानों ने भी इस महीने में कुरआन बहुत ज़्यादा पढ़ा करते थे। वैसे भी कुरआन आम दिनों में पढ़ने से बहुत सवाब प्राप्त होता है परन्तु जो व्यक्ति रमज़ान के महीने में कुरआन ध्यान से पढ़ेगा, उस पर विचार करेगा, उस पर अमल करेगा, एसे व्यक्ति के दामन में नेकियाँ की नेकियाँ होंगी।
5 - रोज़े की हालत में ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह ही से दुआ किया जाएः
दुआ भी एक इबादत है जो केवल अल्लाह से माँगा जाए। अल्लाह तआला रोज़ेदार की दुआ को रद नही करता है जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का इरशाद है " तीन लोगों की दुआ अल्लाह के पास स्वीकारित हैं , रोज़ेदार की दुआ , यात्री व्यक्ति की दुआ, मज़्लूम की दुआ " इसी तरह रोज़ा खोलते समय भी ज़्यादा दुआ करना चाहिये , उस समय की दुआ अल्लाह तआला वापस नही करता है। जैसा कि हदीसों से वर्णित है।
6 - रातों में क़ियाम और तरावीह पढ़ने का महीनाः
इस मुबारक महीने की रातों को तरावीह पढ़ने का खास इह्तमाम किया जाए क्यों कि तरावीह पढ़ने का बहुत ज़्यादा सवाब (पुण्य) है जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है " जो व्यक्ति रमज़ान महीने में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
7- माहि रमज़ान में उम्रा किया जाएः
रमज़ान के महीने में उम्रा करने से भी बहुत ज़्यादा नेकी प्राप्त होती है। जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है " रमज़ान में उम्रा करने का पुण्य मेरे साथ उम्रा करने के बराबर सवाब (पुण्य ) मिलता है " और दुसरी हदीस में आया है कि " रमज़ान में उम्रा करने का पुण्य मेरे साथ हज करने के बराबर सवाब (पुण्य ) मिलता है "
8 - रमज़ान महीने में अधिक से अधिक सदक़ा - खैरात तथा दान दिया जाएः
इस पवित्र महीने में ग़रीबों और मिस्कीनों की दिल खोल कर सहायता और मदद करना उचित और बहुत ज़्यादा सवाब ( पुण्य) का काम है। रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है " सब से अच्छा दान, रमज़ान में दान देना है।" ( सुनन तिर्मिज़ी )
रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इस महीने में बहुत दान ( सदक़ा – खैरात ) किया करते थे जैसा कि अब्दुल्लाह बिन अब्बास( रज़ी अल्लाह अन्हुमा ) वर्णन करते हैं " रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) लोगों में सब से अधिक दानशील थे और रमज़ान के महीने में आप ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) की दानशीलता बहुत बढ़ जाती थी। जब आप ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) फरिश्ते जिब्रील से मुलाक़ात करते थे। फरिश्ते जिब्रील के साथ आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कुरआन पढ़ते- दोहराते थे। रमज़ान के महीने में आप ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) की दानशीलता तेज़ हवा से बढ़ जाती थीं।" ( मुसनद अहमद)
9 - रोज़ेदार को इफतार कराया जाएः
भूके को खाना खिलाना भी बहुत बड़ा पुण्य है और जिसन किसी भूके को खिलाया और पिलाया अल्लाह उसे जन्नत के फल खिलाएगा और जन्नत के नहर से पिलाएगा जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है " जिस किसी मोमिन ने किसी भूके मोमिन को खिलाया तो अल्लाह उसे जन्नत के फलों से खिलाएगा और जिस किसी मोमिन ने किसी पियासे मोमिन को पिलाया तो अल्लाह उसे जन्नत के बिल्कुल शुद्ध पैक शराब पिलाएगा " ( सुनन तिर्मिज़ी )
जो रोज़ेदार को इफतार कराएगा तो उसे रोज़ेदार के बराबर सवाब(पुण्य) मिलेगा और दोनों के सवाब में कमी न होगी जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है " जिसने किसी रोज़ेदार को इफतार कराया तो उसे रोज़ेदार के बराबर सवाब (पुण्य) प्राप्त होगा मगर रोज़ेदार के सवाब में कुच्छ भी कमी न होगी " (मुसनद अहमद तथा सुनन नसई )
10- रमज़ान के महीने में इतकाफ किया जाएः
इतकाफ अर्थात, मानव ईबादत की नीयत से मस्जिद में प्रवेश हो और दुनिया दारी को छोड़ कर केवल अल्लाह की इबादत, कुरआन की तिलावत और दुआ और अपने गलतियों पर अल्लाह से माफी मांगे। इसी तरह जितने समय या जितने दिन के इतकाफ की नीयत किया है, वह अविधि पूरा करे और मानवीय अवश्कता के सिवाए मस्जिद से बाहर न निकले। इतकाफ रमज़ान और रमज़ान के अलावा महिने में भी किया जासकता है, परन्तु रमज़ान के महीने में इतकाफ करना ज़्यादा उत्तम है। रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रमज़ान के महीने में इतकाफ करते थे। जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि " रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ग्यारा रमज़ान से लेकर बीस रमज़ान तक इतकाफ किया फिर इकीस रमज़ान से लेकर तीस रमज़ान तक इतकाफ किया और फिर इसी पर जमे रहे और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बाद आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पत्नियों ने भी आखीरी दस दिनों का इतकाफ किया। ( बुखारी तथा मुस्लिम)
11- शबे क़दर की रातों को तलाशा किया जाए और उन रातों में बहुत ज़्यादा इबादत की जाएः
यह वह मुबारक और पवित्र रात है जिस की महत्वपूर्णता पवित्र कुरआन तथा सही हदीसों से परमाणित है। यही वह रात है जिस में पवित्र कुरआन को उतारा गया। यह रात हज़ार रातों से उत्तम है। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " हम्ने इस (कुरआन) को कद्र वाली रात में अवतरित किया है। और तुम किया जानो कि कद्र की रात क्या है ? कद्र की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है। फ़रिश्ते और रूह उसमें अपने रब की अनुज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं। वह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। " (सुराः कद्र)
रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के हदीस से भी इस रात की बरकत और फज़ीलत साबित होती है। इसी लिए मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने शबे क़दर की रातों को तलाशने का आदेश दिया है। " जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि " रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक वाली रातों में तलाशों " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
12- अल्लाह से क्षमा और माफी माँगी जाएः
यह महीने पापों , गुनाहों , गलतियों से मुक्ति और छुटकारा का महीना है। मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला , क्षमा करने वाला है। खास कर इस महीने के अन्तिम दस रातों में अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों , गलतियों पर माफी मांगा जाए जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न क्या कि यदि मैं क़द्र की रात को पालूँ तो क्या दुआ करू तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " ऐ अल्लाह ! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तो मेरे गुनाहों को माफ कर दे।"
अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे। आमीन............
मंगलवार, 17 अगस्त 2010
पुण्य से अपने झोली को भरने का महीना रमज़ान

रमज़ान का महीना वह पवित्र तथा बर्कत वाला महीना है जिस में अल्लाह तआला ने भलाई और लोगों के लिए कल्याण का काम करने वालों के लिए पुण्य और पापों से मुक्ति ही रखा है। यह वह महीना है जिस में जन्नत ( स्वर्ग) के द्वार खोल दिये जाते हैं तथा जहन्नम (नरक) को द्वार बन्द कर दिये जाते है, सरकश जिन और शैतान को जकड़ दिया जाता है और अल्लाह की ओर से पुकारने वाला पुकारता है , हे ! नेकियों के काम करने वालों , पुण्य के कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लो, और हे ! पापों के काम करने वालों , अब तो इस पवित्र महीने में पापों से रुक जा, और अल्लाह तआला नेकी करने वालों को प्रति रात जहन्नम ( नरक ) से मुक्ति देता है। (सहीह उल जामिअ , अलबानी)
रमज़ान के महिने की सब से महत्वपुर्ण इबादत रोज़ा (ब्रत) है जिसे अरबी में सियाम कहते हैं जिस का अर्थ होता है," रुकना " अर्थातः सुबह सादिक से लेकर सुर्य के डुबने तक खाने – पीने तथा संभोग से रुके रहना, रोज़ा कहलाता है। रमज़ान के महीने का रोज़ा हर मुस्लिम , बालिग , बुद्धिमान पुरुष और स्री पर अनिवार्य है, रोज़ा इस्लाम के पांच खम्बों में से एक खम्बा है। जिसे हर मुस्लिम को हृदय , जुबान और कर्म के अनुसार मानना ज़रुरी है। रोज़े को उसकी वास्तविक हालत से रखने वालों को बहुत ज़्यादा पुण्य प्राप्त होता है जिस पुण्य की असल संख्याँ अल्लाह तआला ही जानता है, प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " मनुष्य के हर कर्म पर, उसे दस नेकी से लेकर सात सौ नेकी दी जाती है सिवाए रोज़े के, अल्लाह तआला फरमाता है कि रोज़ा मेरे लिए है और रोज़ेदार को रोज़े का बदला मैं दुंगा, उस ने अपनी शारीरिक इच्छा ( संभोग) और खाना – पीना मेरे कारण त्याग दिया, ( इस लिए इसका बदला मैं ही दुंगा) रोज़ेदार को दो खुशी प्राप्त होती है, एक रोज़ा खोलते समय और दुसरी अपने रब से मिलने के समय, और रोज़ेदार के मुंह की सुगंध अल्लाह के पास मुश्क की सुगंध से ज़्यादा है। ( बुखारी तथा मुस्लिम)
इसी तरह जन्नत ( स्वर्ग ) में एक द्वार एसा है जिस से केवल रोज़ेदार ही प्रवेश करेंगे, रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है, " जन्नत ( स्वर्ग ) के द्वारों की संख्याँ आठ हैं, उन में से एक द्वार का नाम रय्यान है जिस से केवल रोज़ेदार ही प्रवेश करेंगे "
रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने साथियों को शुभ खबर देते हुए फरमाया " तुम्हारे पास रमज़ान का महिना आया है, यह बर्कत वाला महिना है, अल्लाह तआला तुम्हें इस में ढ़ाप लेगा, तो रहमतें उतारता है, पापों को मिटाता है, और दुआ स्वीकार करता है और इस महिने में तुम लोगों का आपस में इबादतों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने को देखता है, तो फरिश्तों के पास तुम्हारे बारे में बयान करता है, तो तुम अल्लाह को अच्छे कार्ये करके दिखाओ, निःसन्देह बदबख्त वह है जो इस महिने की रहमतों से वंचित रहे. " ( अल – तबरानी)
रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " जो व्यक्ति रमज़ान महीने का रोज़ा अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रखेगा , उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
रोज़ा और कुरआन करीम क़ियामत के दिन अल्लाह तआला से बिन्ती करेगा के रोज़ा रखने वाले , कुरआन पढ़ने वाले को क्षमा किया जाए तो अल्लाह तआला उसकी सिफारिश स्वीकार करेगा, जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है " रोज़ा और कुरआन करीम क़ियामत के दिन अल्लाह तआला से बिन्ती करेगा कि ऐ रब, मैं उसे दिन में खाने–पीने और संभोग से रोके रखा, तू मेरी सिफारिश उस के बारे में स्वीकार कर, कुरआन कहेगा, ऐ रब, मैं उसे रातों में सोने से रोके रखा, तू मेरी सिफारिश उस के बारे में स्वीकार कर, तो उन दोनो की सिफारिश स्वीकार की जाएगी " (मुस्नद अहमद और सही तरग़ीब वत्तरहीब)
फजर से पहले से लेकर सुर्य के डुबने तक खाने – पीने तथा संभोग से रुके रहना ही रोज़ा की वास्तविक्ता नही बल्कि रोज़ा की असल हक़ीक़त यह कि मानव हर तरह की बुराई , झूट , झगड़ा लड़ाइ, गाली गुलूच, तथा गलत व्यवहार और अवैध चीज़ो से अपने आप को रोके रखे ताकि रोज़े के पुण्य उसे प्राप्त हो, जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है " जो व्यक्ति अवैध काम और झूट और झूटी गवाही तथा जहालत से दूर न रहे तो अल्लाह को कोई अवशक्ता नही कि वह भूका, पीयासा रहे " ( बुखारी )
यदि कोई व्यक्ति रोज़ेदार व्यक्ति से लड़ाइ झगड़ा करने की कोशिश करे तो वह लड़ाइ, झगड़ा न करे बल्कि स्थिर कहे कि मैं रोज़े से हूँ, जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है " जब तुम में कोइ रोज़े की हालत में हो तो आपत्तिजनक बात न करे, जोर से न चीखे चिल्लाए, यदि कोइ उसे बुरा भला कहे या गाली गुलूच करे तो वह उत्तर दे, मैं रोज़े से हूँ। " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
गोया कि रमज़ान महिने में अल्लाह तआला की ओर से दी जाने वाली माफी, अच्छे कामों से प्राप्त होनी वाली नेकियाँ उसी समय हम हासिल कर सकते हैं जब हम रोज़े की असल हक़कीत के साथ रोज़े रखेंगे और एक महिने की प्रयास दस महिने की कोशिश के बराबर होगी।
अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे ताकि हमारी झोली में पुण्य ही पुण्य हो, आमीन
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