हमारे जहन में यह प्रश्न बार बार आता है कि ईश्वर कैसा हो ? उस के गुन कैसे हों ? वह कहाँ स्थापित हैं ?
ईश्वर एक ऐसा शब्द है जो जहन में आते ही एक बहुत ही महान वक्तित्व की कल्पना जहन में आता है जो हर वस्तु का स्वामी और पालणपोषक हो। उसने हर वस्तु को एकेले ही उत्पन किया हो, पूरे संसार को चलाने वाला वही हो, धरती और आकाश की हर चीज़ उसके आज्ञा का पालन करती हो, अपनी सम्पूर्ण विशेष्ताओं और गूनों में पूर्ण हो, जिसे खाने पिने की आवशक्ता न हो, विवाह और वंश तथा संतान की ज़रूरत न हो, तो केवल वही ज़ात उपासना के योग्य होगी और केवल वही इबादत की हक्दार होगी।
अल्लाह तआला ही केवल वह ज़ात है जो सब गूनों और विशेष्ताओं में पूर्ण है। जिस में से कुछ का ज्ञान उसने अपने दूतों और पुस्तकों के माध्यम से दिया है और कुछ अपने पास गुप्त रखा है तो उन नामों और गूनों एवं विशेष्ताओं को वैसे ही माना जाए जिस प्रकार उस का बयान हुआ है।
अल्लाह तआला की कुछ महत्वपूर्ण विशेष्ता पवित्र कुरआन की इन आयतों से स्पष्ठ होती हैं।
ऐ नबी कहो, वह अल्लाह यकता है, अल्लाह सब से निरपेक्ष है और सब उसके मुहताज हैं। न उस की कोई संतान है और न वह किसी की संतान। और कोई उसका समकक्ष नहीं है। ( सूरः अल-इख्लास)
और कुरआन के दुसरे स्थान पर अल्लाह ने अपनी यह विश्ष्ता बयान किया है।
( وأن الله هو العلي الكبير" ( الحج : 62
“ और निः संदेह अल्लाह ही उच्च और महान है। ( सूरः अल- हजः 62)
अल्लाह तआला अपने विशेष्ताओं और गुनों में सम्पूर्ण है और वह हर कमी और नक्स से पवित्र है।
अल्लाह तआला की कुछ महत्वपूर्ण विशेष्ताओं और गुनों का बयान इन आयतों से होता हैं।
الله لا اله إلا هو , الحيّ القيوم , لا تأخذه سنة و لا نوم , له ما في السموات وما في الأرض , من ذالّذي يشفع عنده إلا بإذنه , يعلم ما بين أيديهم وما خلفهم , ولا يحيطون بشيء من علمه إلا بما شاء , وسع كرسيّه السموات والأرض , ولا يؤده حفظهما , وهو العلي العظيم, لااكراه في الدين , قد تبين الرشد من الغيّ ,فمن يكفر بالطاغوت ويؤمن بالله فقد استمسك بالعروة الوثقى , لا انفصام لها , والله سميع عليم
इस आयत का अर्थः अल्लाह वह जीवन्त शाश्वत सत्ता, जो सम्पूर्ण जगत् को सँभाले हुए है, उस के सिवा कोई पुज्य नही हैं। वह न सोतो और न उसे ऊँघ लगती है। ज़मीन और आसमानों में जो कुछ है, उसी का है। कौन है जो उस के सामने उसकी अनुमति के बिना सिफारिश कर सके ? जो कुछ बन्दों के सामने है उसे भी वह जानता है और जो कुछ उस से ओझल है, उसे भी वह जानता है और उसके ज्ञान में से कोई चीज़ उनके ज्ञान की पकड़ में नहीं आ सकती, यह और बात है कि किसी चीज़ का ज्ञान वह खुद ही उनको देना चाहे। उसका राज्य आसमानों और ज़मीन पर छाया हुआ है और उनकी देख रेख उसके लिए थका देने वाला काम नहीं है। बस वही एक महान और सर्वोपरि सत्ता है , दीन ( धर्म) के मामले में कोई जोर ज़बरदस्ती नहीं है। सही बात गलत विचारों से अलग छाँटकर रख दी गई है। अब जिस किसी ने बढ़े हुए फसादी का इनकार करके अल्लाह को माना, उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटने वाला नही और अल्लाह सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है। ( सूरः अल- बकराः 256)
अल्लाह तआला ही तने तन्हा संसार और उसकी हर वस्तु का मालिक और स्वामी है, उसी ने सम्पूर्ण वस्तु की रचना की है, वही सब को जीविका देता है, वही सब को मृत्यु देता है, वही सब को जीवित करता है। इसी चीज़ को याद दिलाते हुए अल्लाह तआला फरमाया है।
رب السموات و الأرض و مابينهما إن كنتم مؤقنين – لا إله إلا هو , يحي ويميت ربكم ورب آباءكم الأولين " [ الدخان
अर्थातः “ वह आकाशों और धर्ती का रब और हर उस चीज़ का रब जो आकाशों और धर्ती के बीच हैं यदि तुम लोग वास्तव में विश्वास रखने वाले हो, कोई माबूद उसके सिवा नही है। वही जीवन प्रदान करता है और वही मृत्यु देता है। वह तुम्हारा रब है और तुम्हारे उन पुर्वजों का रब है जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं।” (सूरः दुखान)
इसी तरह अल्लाह तआला को उनके नामों और विशेष्ताओं में एक माना जाऐ, और अल्लाह के गुनों और विशेष्ताओं तथा नामों में कोई उसका भागिदार नही है।
इसी तरह अल्लाह के इन विशेष्ताओं और गुनों को वैसे ही माना जाऐ जिस तरह अल्लाह ने उसको अपने लिए बताया है या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस विशेष्ता के बारे में खबर दिया है और उन विशेष्ताओं और गुनों को न माना जाऐ जिस विशेष्ता का इन्कार अल्लाह ने अपने से किया है या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस विशेष्ता का इन्कार किया है, जैसा कि अल्लाह तआला का कथन पवित्र कुरआन में है।
" ليس كمثله شيء وهوالسميع البصير "
“ अल्लाह के जैसा कोई नही है और अल्लाह तआला सुनता और देखता है।” ( सूरः शूराः 42)
इस लिए अल्लाह के सिफात और गुनों को वैसे ही माना जाऐ जैसा कि अल्लाह ने खबर दिया है या उसके नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने खबर दिया है। न ही उस सिफात के अर्थ को बदला जाए और न ही उसके अर्थ का इनकार किया जाए और न ही उस सिफात की कैफियत बयान की जाए और न ही दुसरे किसी वस्तु से उसकी उदाहरण दी जाए, बल्कि यह कहा जाए कि अल्लाह तआला सुनता है, देखता है, जानता है, शक्ति शाली है जैसा कि अल्लाह के शान के योग्य है, वह अपनी विशेष्ता में सम्पूर्ण है। कोई भी वस्तु उस जैसा नही हो सकता और न ही उस के विशेष्ता में भागिदार हो सकता है।
इसी तरह उन सर्व विशेष्ताओं और गुनों को अल्लाह से इन्कार किया जाए जिस का इन्कार अल्लाह ने अपने नफ्स से किया है या अल्लाह के नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने उस सिफत का इन्कार अल्लाह से किया है। यह आस्था रखते हेतु कि इस सिफत के विपरित सिफत में अल्लाह सम्पूर्ण और कमाल को है और जिस शब्द से अल्लाह के नाम या विशेष्ताओं में कमी या खराबी पाया जाए तो उसका इन्कार अनिवार्य है। जैसाकि अल्लाह तआला का आज्ञा है।
و لله الأسماء الحسنى فادعوه بهاوذرواالذين يلحدون في أسمائه سيجزون ما كانوايعملون [الأعراف:180
अर्थातः अल्लाह अच्छे नामों का अधिकारी है। उसको अच्छे ही नामों से पुकारो और उन लोगों को छोड़ दो जो उसके नाम रखने में सच्चाइ से हट जाते है, जो कुच्छ वह करते हैं वह उसका बदला पा कर रहेंगे।
अल्लाह तआला की विशेष्ता दो तरह की है।
(1) अल्लाह की व्यक्तिगत विशेष्ताः अल्लाह तआला इस विशेष्ता से हमेशा से है और हमेशा रहेगा, उदाहरण के तौर पर , अल्लाह का ज्ञान , अल्लाह का सुनना , देखना , अल्लाह की शक्ति , अल्लाह का हाथ, अल्लाह का चेहरा, आदि और इन विशेष्ता को वैसे ही माना जाए जैसा कि अल्लाह तआला के योग्य है और न ही इन विशेष्ताओं की अर्थात को परिवर्तन की जाए और न ही इन विशेष्ताओं के अर्थात का इन्कार की जाए और न ही इन विशेष्ताओं को दुसरे किसी वस्तु से उदाहरण दी जाए और न ही इन विशेष्ताओं की अवस्था या हालत बयान की जाए।
(2) अल्लाह की इख्तियारी विशेष्ताः यह वह विशेष्ता है जो अल्लाह के इच्छा और इरादा पर निर्भर करता है। यदि अल्लाह चाहता है तो करता और नही चाहता तो नही करता, उदाहरण के तौर पर यदि अल्लाह तआला किसी दास के अच्छे काम पर प्रसन्न होता है तो किसी दास के बुरे काम पर अप्रसन्न होता है, किसी दास के अच्छे काम से खुश को कर उसे ज़्यादा रोज़ी देता है तो किसी के बदले को परलोकिक जीवन के लिए सुरक्षित कर देता है जैसा वह चाहता है करता है आदि ।
इसी लिए केवल उसी की पूजा और उपासना की जाए। उस की पूजा तथा इबादत में किसी को भागिदार न बनाया जाए। अल्लाह तआला ने लोगों को अपनी इन नेमतों को याद दिलाते हुए पूरे मानव को अपनी पूजा का आज्ञा दिया है।
ياأيهاالناس اعبدوا ربكم الذي خلقكم و الذين من قبلكم لعلكم تتقون- الذي جعل لكم الأرض فراشا و السماء بناء وانزل من السماء ماء فأخرج به من الثمرات رزقا لكم فلا تجعلوا لله أندادا وأنتم تعلمون " [البقرة: 22
अर्थातः "लोगों , पूजा करो अपने उस रब (मालिक) की जो तुम्हारा और तुम से पहले जो लोग हूऐ हैं उन सब का पैदा करने वाला है। तुम्हारे बचने की आशा इसी प्रकार हो सकती है। वही है जिसने तुम्हारे लिए धर्ती को बिछौना बिछाया, आकाश की छत बनाई, ऊपर से पानी बरसाया और उसके द्वुवारा हर प्रकार की पैदावार निकाल कर तुम्हारे लिए रोजी जुटाई, अतः जब तुम यह जानते हो तो दुसरों को अल्लाह का समक्ष न ठहराऔ "
जो लोग आकाश एवं धरती के मालिक को छोड़ कर मृतक मानव, पैड़, पौदे, पथरों और कम्ज़ोर वस्तुओं को अपना पूज्य बना लेते हैं जो कोई भी काम करने की शक्ति नही रखते बल्कि वह खुद ज़रूरत मन्द हैं कि लोग उनकी सेवा करे और उसका खयाल रखे जैसा कि अल्लाह तआला ने एक उधाहरण के माध्यम से लोगों को समझाया है।
ياأيهاالناس ضرب مثل فاستمعوا له ان الذين تدعون من دون الله لن يخلقوا ذبابا ولو اجتمعوا له وأن يسلبهم الذباب شيئا لا يستنقذوه منه- ضعف الطالب والمطلوب "[ الحج:73
हे लोगो ! एक मिसाल दी जा रही है, ज़रा ध्यान से सुनो, अल्लाह के सिवाय तुम जिन जिन को पुकारते रहे हो वे एक मक्खी तो पैदा नहीं कर सकते अगर मक्खी उन से कोई चीज़ ले भागे तो यह उसे भी उस से छीन नहीं सकते। बड़ा कमज़ोर है माँगने वाला और बहुत कमज़ोर है जिस से माँगा जा रहा है।
धरती और आकाश की हर चीज़ को अल्लाह तआला ही ने उत्पन किया है। इन सम्पूर्ण वस्तु को वही रोज़ी देता है, सम्पूर्ण वस्तु में वही तसर्रुफ करता है। तो यह बिल्कुल बुद्धि के खिलाफ है कि कुछ लोग अपने ही जैसों या अपने से कमतर की पुजा और उपासना करे, जब कि वह भी उनही की तरह ज़रूरतमन्द और मुह्ताज है। जब मख्लूक में से कोइ भी सच्चा माबूद का हक्दार नही है तो वही इबादत का हक्दार हुआ जिस ने इन सारी चीज़ों को पैदा किया है और वह केवल अल्लाह तआला की ज़ात है जो हर कमी और ऐब से पवित्र है।
अल्लाह तआला कहाँ है ?
अल्लाह तआला आकाश के ऊपर अपने अर्श (राजगद्दी) पर है। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है।
" (الرحمن على العرش استوى " ( سورة طه: 5
इस आयत का अर्थः वह करूणामय स्वामी ( जगत के) राज्य सिंहासन पर विराजमान है।
यही कारण है कि प्रत्येक मानव जब बहुत कठिनाई तथा संकट में होता है तो वह आकाश की ओर देखते हुए प्राथना करता है कि ऐ ईश्वर तू मुझे इस संकट तथा परेशानी से निकाल दे और बार बार उस की निगाह आसमान की ओर उठती है। किन्तु जब वह खुशहाली में होता तो उसे छोड़ कर अन्गिनित द्वारों का चक्कर काटता है और अपने व्यक्तिगत को रुसवा तथा ज़लील करता है।
गोया कि हर मानव का हृदय कहता है कि ईश्वर ऊपर है परन्तु रितिरेवाज के चक्कर में अपने वास्तविक पालनहार को छोड़ कर बेजान वस्तुओं की भक्ति में ग्रस्त है जिस का उसे लाभ प्राप्त न होगो और नुक्सान एवं हाणि उठाएगा।
अल्लाह तआला हम सब को वास्तविक घाटा और सम्पूर्ण प्रकार के हाणि से सुरक्षित रखे। आआमी।।।।।।।न
जीवन बहुमूल्य है जिस के सही प्रयोग से ही हमें सफलता प्राप्त होगी और हम कभी भी दुसरों के लिए गढा न खोदें, संभावना है कि कहीं हम ही न उस गढे में गिर जाए।
बुधवार, 30 मार्च 2011
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
अच्छे आचरण के लिए महत्वपूर्ण विशेष्ता
इस्लाम ने अच्छे आचरण और स्वभाव वाले व्यक्तियों को उच्च स्थान पर स्थापित किया है। उत्तम व्यवहार एवं सुन्दर आचार एक आदर्श समाज की निर्माण के लिए ईंट का काम करती है और सुन्दर संस्कृति की निर्माण के लिए ठोस नीव है। अच्छे व्यवहारिक व्यक्ति उसी समय माना जाएगा जब उस व्यक्ति के अन्दर कुछ महत्वपूर्ण विशेष्ता पाई जाए। बहुत सारे खुबियों का मालिक हो, तब ही वह अच्छे स्भाव वाला कहलाएगा और लोगों के पास उसी समय वह आदर- सम्मान वाला माना जाएगा जब वह इन अच्छे स्भाव का मालिक होगा।
(1) सत्य बोलता हो और सच बोलने वालों को पसन्द करता हो, क्यों कि सत्य बोलना एक ऐसा सुन्दर गुन है जिसे प्रत्येक काल में सम्मानजनक माना गया है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को नबी बनाए जाने से पहले ही समुदाए वाले, मक्का वाले, बहुत सच्चा और अमानतदार के उपाधि से पुकारते थे। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का बड़े से बड़ा विरोधि और बड़े से बड़ा शत्रु भी आप को कभी झुट बोलने का आरोप न लगाया और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सच्चा होने की गवाही दी है। जैसा कि रूम के राजा हिरक़ल के साम्ने अबू सुफ्यान (रज़ि अल्लाहु अन्हु) इस्लाम स्वीकार करने से पहले आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सच्चा होने की गवाही दी। अल्लाह तआला ने सर्व मानव को सच बोलने वालों का साथ देने का आदेश दिया है। अल्लाह तआला का कथन है। " ऐ लोगों जो ईमान लाए हो, अल्लाह से डरो और सच्चे लोगों का साथ दो, " ( अत-तौबाः 119)
इसी प्रकार जो लोग हमेशा सच बोलते हैं और सच बोलने वालों का साथ देते हैं तो ऐसे लोग अल्लाह के पास सच्चे लिख दिये जाते हैं। अच्चे से ज़रा नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कथन पर विचार करें। " बैशक सच्चाइ नेक रास्तों की तरफ मार्ग दर्शन करती है, और नेकियाँ जन्नत की ओर ले जाती है और मानव हमेशा सच बोलता है यहां तक कि अल्लाह के पास सच्चा लिख दिया जाता है " ( )
गोया कि सच बोलना, सत्य के रास्ते पर चलना, अच्चे आचार के भाग में से एक भाग है।
(2) नर्म हृदय वाला होना, सद स्वभाव में से है कि मानव एक दुसरे के साथ कृपाशील हो, एक दुसरे पर दया करे, हमारे प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बहुत ज़्यादा दयावान और कृपा करने वाले थे। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का व्यवहार प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक जैसा था। गरीब हो, या धनवान, समुदाय का सरदार हो, या आम जनता, प्रत्येक के साथ कृपा का व्यवहार करते थे। व्यवहार में किसी में कोई अन्तर नही करते थे। अल्लाह तआला ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के इसी दया एवं कृपा को याद दिलाया है। अल्लाह तआला का कथन है, ऐ नबी! यह अल्लाह की दयालूता है कि तुम उन लोगों के लिए बहुत नर्म स्भाव के हो, यदि कहीं, तुम क्रूर स्भाव, और कठोर हृदय के होते तो यह सब तुम्हारे आस- पास से छंट जाते, तो उन की गलतियां माफ करो, उन के लिए अल्लाह से क्षमा की दुआ करो और धर्म के कार्य में उन्को भी प्रामर्श में सम्मिलित रखो, " ( आलि- इम्रान- 159)
प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की दयालूता का एक उदाहरण देता हूँ। कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने साथियों के साथ मस्जिद में बैठे हुए शिक्षा दे रहे थे। इसी बीच एक गाँव-खेड़ा का रहने वाला आया और मस्जिद के एक किनारे में पैशाब करने लगा। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथी उठे ताकि उस गाँव वाले को डान्टे डप्टे, बुरा भला कहे, परन्तु रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने साथियों को मना फरमाया और कहा उस के पैशाब की स्थान पर एक डोल पानी डाल दो, बैशक तुम्हें आसानियाँ करने वाला बना कर भेजा गया है और सख्ती करने वाला बना कर नही भेजा गया और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बड़े प्रेम से उस आदमी को बुला कर कहा, यह मस्जिद इस लिए नही बनाइ गई कि तुम पैशाब करो, बल्कि अल्लाह की इबादत, और नमाज़ पढ़ने के लिए बनाइ गई है। प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सेवक अनस बिन मालिक कहते हैं कि मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की दस वर्ष तक सेवा की परन्तु आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कभी भी मुझे डांटा नही, और मैं ने कभी आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कोइ काम में गलती कर दिया तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यह नहीं कहा कि तुम ने ऐसा क्यों किया? और कभी आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कोइ काम न किया तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यह नहीं कहा कि तुम ने ऐसा क्यों नही किया ?, और रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सब लोगों में सब से अधिक स्भाव के थे। ( सही बुखारी तथा सही मुस्लिम)
(3) क्षमा एवं माफीः प्रत्येक मानव से गलती , भूल- चुक होती है, इस लिए अपने अधीन और सहायकों एवं नौकर चाकर की गलती- भुल-चुक को माफ कर देना भी अच्छे आचरण, स्भाव तथा उत्तम व्यवहार में आऐगा, रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सद्स्भाव के अतिउत्तम स्थान पर स्थापित थे, ज़रा याद करें कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को मक्का वासियों ने कितना सताया, बहूत ज़्यादा अत्याचार किया, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथियों को हर प्रकार से परिशान किया, परन्तु जब अल्लाह तआला ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को मक्का वासियों पर जीत दी, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का बड़ा से बड़ा शत्रू भी आप के कब्ज़े में आ चुका था तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सब को माफ कर दिया, अपने जानी दुश्मनों से भी कुछ न कहा, बल्कि वह ऐतहासिक वाक्या कहा जिसे इतिहास ने सुनह्रे शब्दों से लिख दिया, " आज तुम पर कोइ अत्याचार नही, कोइ भर्त्सना नही, बल्कि जाओ, तुम सब स्वतंत्र हो, "
आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कभी भी आप पर अत्याचार या अशुद्ध व्यवहार करने वालों से बद्ला न लिया बल्कि उन की कष्टाओं, यातनाओं को सहते रहे और उन्हें क्षमा करते रहे। अनस (रज़ी अल्लाह अन्हु) कहते हैं कि, मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथ जा रहा था आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) एक मोटी चादर ओढ़ रखी थी, अचानक एक देहाती आया और उस ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की चादर पकड़ कर बहुत शक्ति से खींचा कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के गरदन मुबारक पर चादर के निशान देखा, फिर उस देहाति ने कहा, ऐ मोहम्मद! तुम उस धन में से मुझे देने का आदेश दो जो अल्लाह ने तुम्हें दे रखा है, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उस की ओर मुड़े, और मुस्कुराए और उसे धन-दौलत देने का आदेश दे दिया " ( सही बुखारी तथा सही मुस्लिम)
आप ने देखा, किस प्रकार उस देहाती ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथ दुर्व्यवहार से पेश आया परन्तु आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) न उस दुर्व्यवहार का शुद्ध व्यवहार से जवाब दिया। उसे क्षमा कर दिया और न क्रोध हुए, और न ही उसे डांटा डपता, बल्कि उसे धन-दौलत दे कर भेज दिया, प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के इसी शुद्ध व्यवहार से प्रभावित हो कर लोग बड़ी संख्या में इस्लाम स्वीकार लेते थे।
(4) दान शीलताः दान शीलता एक ऐसा गुण और खूबी है जो अच्छे आचार तथा व्यवहार की पूष्ठी करता है। मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) भी बहुत ज़्यादा दान शील थे। जैसा कि जाबिर बिन अब्दुल्लाह बयान करते हैं कि" जब भी रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से कुछ मांगा गया तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इनकार न किया," ( सही बुखारी तथा सही मुस्लिम)
सुहैल बिन सअद (रज़ी अल्लाह अन्हु) कहते हैं कि, एक महिला नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास एक चादर ले कर आइ और कहा, ऐ अल्लाह के रसूल (संदेष्ठा)! यह आप के पहन ने के लिए है। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उसे स्वीकार कर लिया क्यों कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को उसकी अवश्यकता थी। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उसे पहन भी लिया। कुछ देर के बाद एक आदमी ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल (संदेष्ठा)! यह चादर बहुत सुन्दर है। यह आप मुझे दे दीजिये, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उत्तर दिया , ठीक है। इस के बाद जब रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) वहां से चले गये तो दुसरे सहाबा (रज़ी अल्लाह अन्हुम) उस आदमी से कहने लगे कि तुम्ने ऐसा क्यों किया ? तुम को मालूम है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कोइ चीज़ मांगने पर इनकार नही करते और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को इस चादर की ज़रूरत थी, तो उस आदमी ने कहा, मैं प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पहन ने की बरकत की आशा रखता हूँ, और मैं इसी कपड़ा में दफनाया जाऊंगा,( )
(5) न्याय और बराबरीः इसी तरह अच्छे आचरण के गुणों में से है कि सब लोगों के बीच न्याय किया जाए और न्याय में गरीब और धनीवान में अन्तर न किया जाए , रिश्तेदार और गैर रिश्तेदार में अन्तर न किया जाए, और अपने धर्म तथा दुसरे धर्म वालों में अन्तर न किया जाए बल्कि सबूतों, गवाहियों, प्रमाणों की रोशनी में न्याय के साथ फेसला किया जाए। इसी तरह का किस्सा मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जीवन में आया कि एक मुस्लिम और यहुदी ( गैर-मुस्लिम) के बीच किसी चीज़ में झगड़ा हो गया और दोनों ने न्याय के लिए मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास आये। दोनों की बात सुन ने के बाद, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फसला यहुदी ( गैर-मुस्लिम) के पक्ष में दिया ।
अल्लाह तआला ने सर्व मानव को आदेश दिया कि लोगों के बीच न्याय किया जाए, न्याय की बात कही जाए । अल्लाह का कथन है, " और जब बात कहो, इन्साफ की कहो चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो " ( अल- अन्आमः152)
इसी तरह विरोधी या शत्रु के बीच भी न्याय किया जाए, दुश्मनी एवं शत्रुता न्याय करने से मानव को नही रोके जैसा कि अल्लाह तआला का आज्ञा है। " ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अल्लाह के लिए औचित्य पर कायम रहने वाले और इनसाफ की गवाही देने वाले बनो, किसी गिरोह की दुश्मनी तुमको इतना उत्तेजित न कर दे कि इनसाफ से फिर जाओ। इनसाफ करो, यह ईशभक्त और विनम्रता के अधिक अनुकुल है। अल्लाह से डरकर रहो, जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसे पूरी तरह जानता है।" ( अल- माइदाः 8)
कोइ भी मानव उसी समय उत्तम आचार वाला माना जाएगा जब वह प्रत्येक के साथ न्याय और इनसाफ करे, अपने आप के साथ, अपने माता पिता से साथ, अपने संतान के साथ, अपने पत्नी के साथ, अपने रिश्तेदार और नाते दार के साथ, अपने समाज के साथ, अपने मुल्क, देश के साथ ताकि वह अच्छे आचरण वालों में उसका शुमार हो,।
इसी तरह अच्छे आचरण में से है कि लोगों के भेदों को छुपाया जाए, लोगों के राज़ों को सार्वजनिक न किया जाए। लोगों के व्यक्तिगत खराबियों का प्रचार न किया जाए। बल्कि उसे छुपाया जाए ताकि अल्लाह तआला क़ियामत के दिन इस संसार में लोगों की खराबियों को छुपाने वालों की खराबियों का छुपायेगा। उस के अपराधों तथा पापों को क्षमा करेगा। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " जो व्यक्ति किसी मुस्लिम के खामियों को छुपाएगा तो अल्लाह तआला क़ियामत के दिन उस के खामियों को छुपाऐगा "
इस के अलावा भी कुछ अच्छे गुन हैं जिस को अपनाने वालों की प्रशंसा बयान किया जाता है और ऐसे व्यक्तियों को अच्छे आचरण वाला माना जाता है।
मंगलवार, 25 जनवरी 2011
गणतंत्र दिवस
आज 26 जनवरी ऐतिहासिक दिन है जिस दिन प्रत्येक भारतीय के हृदय में देश भक्ति की लहरें उठता है। यही वह दिन है जब जनवरी 1930 में लाहौर में पंडित जवाहर लाल नेहरु ने तिरंगा फहराया था और स्वतंत्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की घोषणा की थी।
26 जनवरी 1950 वह दिन था जब भारतीय गणतंत्र और इसका संविधान प्रभावी हुए। यही वह दिन था जब 1965 में हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया।
इस अवसर के महत्व के दर्शान के लिए हर वर्ष गणतंत्र दिवस पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, और राजधानी, नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के समीप रायसीना पहाड़ी से राजपथ पर गुजरते हुए इंडिया गेट तक और बाद में ऐतिहासिक लाल किले तक शानदार परेड का आयोजन किया जाता है।
इस लिए हम आज गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर अपने सब भारतीयों को शुभ कामनाए देते हैं और देश की प्रगति और तरक्की के लिए दुआ करते हैं। सब देशवासियों से बिन्ती करते हैं कि भारत की प्रगति, उत्पादन, तरक्की और देश की छवी को सुन्दर से अतिसुन्दर करने के लिए मिल जुल कर काम करें और उन लोगों का बाइकाट करें जो हमारे देश को बांटने का काम करते हैं और भारत की प्रगती के रास्ते में रोड़ा अटकाते है और आतंकवादी के रूप में हमारे प्रिय देश को लहुलहान करते हैं।
सफर का महीना ( अपशकुन)
इस्लामिक महीनों में से एक महिने का नाम सफर है जो केलन्डर सूची के अनुसार दुसरा महीना है। इस महीने को सफर इस लिए कहा जाता है क्यों कि इस्लाम से पहले अरब वासियों दुसरे समुदाय पर आक्रमण करते थे और सब कुछ लूट लेते और कुछ भी न छोड़ते थे, इसी लिए इस महीने को सफर कहा जाता था और अरब वासियों इस महीने में दो बड़े अप्राध में ग्रस्त थे।
पहलाः इस महीने को अपने स्वार्थ के कारण आगे – पीछे कर लेते थे।
दुसराः इस महीने को मानते थे।
इस्लाम ने पूर्व अरबवासियों के दोनों कार्यों का बहुत ज्यादा खंडन किया है और एक साफ सुथ्रा मन्त्र अल्लाह पर विश्वास पेश किया है जो हर प्रकार से पवित्र और लाभदायक है।
पहलाः इस्लाम से पहले अरब वासियों सफर के महीने को अपने स्वार्थ के कारण आगे – पीछे कर लेते थे जिस महीने को अल्लाह तआला ने आदर- सम्मान वाला बनाया था, उस में पूर्व अरबवासी उलट फेर कर देते थे। अल्लाह ने उसी उलट फेर की निति को अशुद्ध करार किया। सफर का महीना वर्ष के बारा महीने में से दुसरा महीना है। अल्लाह तआला के पास उन में से चार महीने आदर ( हुरमत वाले) हैं। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है , ” वास्तविकता यह है कि महीनों की संख्या जब से अल्लाह ने आसमान और जमीन की रचना की है, अल्लाह के लेख में बारह ही है और उन में से चार महीने आदर के (हराम) हैं, यही ठीक नियम है, अतः इन चार महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म न करो, ” ( अल- तौबाः 36 )
इसलाम से पूर्व अरबवासी इस चार महीनों के आदर ( हुरमत) को जानते थे और उस के अनुसार अमल करने का प्रयास भी करते थे परन्तु अपने आर्थिक स्वाद के लिए मुहर्रम महीने को सफर महीने से बदल देते थे और कभी सफर के स्थान पर मुहर्रम महीने से परिवर्तन कर देते थे। अल्लाह तआला ने मुश्रिकीन (इसलाम से पूर्व अरब वासी) के इसी निति का खंडण किया है और खुले शब्दों में मानव को आदेश दे दिया कि तुम इस महीनों में उलट फेर करके अपने ऊपर अत्याचार न करो, अल्लाह तआला ने जो नियम बना दिया है उस में संशोधन नही हो सकता यदि जो संशोधन करने का प्रयास करेगा वह अपने ऊपर ज़ुल्म करेगा। यदि कोइ मानव महीने की उलट फेर करता है तो उसे कोइ लाभ तो न होगा बल्कि वास्तविक घाटा उठाएगा।
दुसरी बड़ी खलती जो पूर्व अरब वासी इस महीने में करते थे कि वह लोग सफर महीने को अपशकुन मानते थे। बल्कि आज के भी बहुत से लोग सफर के महीने को अपशकुन मानते हैं और बहुत सा वह काम करते हैं जो शिर्क के सूची में आता है। अपशकुन कहते हैं ” कोइ व्यक्ति किसी काम करने जा रहा हो और उसी समय बिल्ली रास्ता काट दे, या किसी नापसन्द व्यक्ति को देख ले, या शीशा गिर कर टूट जाए तो अपशकुन माना जाए कि अब हमारा यह काम न होगा और उस काम को न किया जाए।
अल्लाह तआला के आज्ञा के अनुसार हर वस्तु अपने अन्जाम को पहुंचती है। किसी भी मख्लूक (वस्तु) के पास उस चीज को रोकने की शक्ति नही, यदि कोइ व्यक्ति शक्ति उस चीज में मान कर वह काम नही करता तो उसने अल्लाह तआला से विश्वास हटा कर बन्दों को लाभ या हाणी का मालिक मानता है तो यही शिर्क है। प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस अपशकुन से खुले शब्दों में मना फरमाया है
” عن أبي هريرة قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : ” لا عدوى ولا طيرة ولا هامَة ولا صَفَر وفر من المجذوم كما تفر من الأسد ” رواه البخاري
अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” छूत वाला रोग स्वयं नही लगता, और न ही अपशकुन होता, और न उल्लू के बोलने कोई फरक पड़ा, और न ही सफर महीने का असर है और तुम कोढ़ी से वेसे भागो जेसे शेर से भागते हो ” ( सही बुकारी)
उक़बा बिन आमिर (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सामने शुभ शकुन का जिकर आया तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” शुभ शकुन अच्छी चीज़ है और मुसलमान को अपशकुन किसी काम से नही रोकती, जब तुम में से कोइ अप्रिय चीज़ देखे तो कहे, ऐ अल्लाह ! तेरे सिवा कोई भलाई लाने वाला नही, और न ही तेरे सिवा कोई बुराई दूर कर सकता है और न ही तेरे सिवा किसी को शक्ति तथा ताकत है ” ( अबी दाऊद )
अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” अपशकुन शिर्क है, अपशकुन शिर्क है, (अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद (रज़ी अल्लाह अन्हु) कहते है) , हम में से प्रत्येक व्यक्ति के जहन में इस प्रकार क चिन्ता आता है परन्तु अल्लाह पर विश्वास और भरोसा से यह चीज समाप्त होजाती है ” ( सुनन अबी दाऊद व सुनन तिर्मिजी)
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” जिसे अपशकुन ने किसी काम से रोक दिया तो उसने शिर्क किया।…. ( मुस्नद अहमद )
इसी तरह किसी महीला से अपशकुन लेना या पक्षी से अपशकुन लेना भी शिर्क के सुची में आएगा क्यों इन चीजों में कुछ भी शक्ति नही कि किसी को लाभ या नुक्सान पहुंचाए। फायदे या लाभ का वास्तविक मालिक एल्लाह तआला है। अल्लाह जिसे चाहे लाभ पहुंचाए और जिसे चाहे नुक्सान पहुंचाए फिर हम अपने जैसे किसी मख्लूक को उस चीज़ का दोषी क्यों ठहराए जिसा का वह मालिक नही।
सोमवार, 10 जनवरी 2011
मुस्लिम का व्यवहार
इस्लामिक जीवन में अच्छे आचार तथा व्यवहार बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसी कारण इस्लाम ने अच्छे आचरण और स्वभाव व्यक्तियों को उच्च स्थान पर स्थापित किया है। उत्तम व्यवहार एवं सुन्दर आचार एक आदर्श समाज की निर्माण के लिए ईंट का काम करती है और सुन्दर संस्कृति की निर्माण के लिए ठोस नीव है। अच्छे व्यवहार की ओर सर्व नबियों, रसूलों ने आमंत्रण किया है।
इस लिए इस्लाम ने अपने अनुयायियों को प्रत्येक उत्तम व्यवहार और स्वभाव का शिक्षण दिया और अशुद्ध आचार से दूर रहने का आदेश दिया। यही कारण कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने खुले शब्दों में कह दिया कि मेरे नबी बना कर भेजे जाने का लक्ष्य ही उत्तम आचार का प्रचार करना है। मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है, " انما بعثت لأتمم مكارم الأخلاق "
निःसंदेह मुझे केवल इसी लिए भेजा गया कि मैं उत्तम आचार की ओर बुलाता रहूँ " ( मुस्नद अहमद )
जब मानव का आचार अच्छा होगा तो उसका ईमान भी सम्पूर्ण होगा और उस के जन्नत में प्रवेश होने की संभावना भी अधिक होगी जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है,
وعن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ": أكمل المومنين ايماناأحسنهم خلقا و خياركم خياركم لنسائهم خلقا " - أخرجه أحمد والترمذي
अर्थातः अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " सब से सम्पूर्ण और सर्वश्रेष्ट मुस्लिम वह है जो व्यवहार के अनुसार सब से अच्छा हो, और तुम में से उत्तम वह है जो अपनी पत्नियों के साथ अच्छा व्यवहार करे "।
इसी प्रकार जो लोग अच्छे व्यवहार के साथ जीवन गुज़ारते हैं और उत्तम आचार के साथ लोगों से मिलते जुलते हैं, लोगों को किसी प्रकार की तकलीफ नही देते, तो ऐसा व्यक्ति क़ियामत के दिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के निकट्तम होंगे जैसा कि जाबिर बिन अब्दुल्लाह से वर्नण है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया
إن من أحبكم إليّ و أقربكم مني مجلسا يوم القيامة أحاسنكم أخلاقا " - أخرجه الترمذي وحسّنه"
मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथी जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ी अल्लाह अन्हु) कहते है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " निःसंदेह तुम मेरे पास ज्यादा प्रिय और बैठक के अनुसार ज्यादा नज्दीक होंगे जो अच्छे और उत्तम आचार वाले होंगे "
उत्तम आचार , उम्दा मेल-जोल, मीठे बोल-चाल के माध्यम से एक मूमीन हमेशा रोज़ा रखने वाले, हमेशा नमाज़ पढ़ने वाले के पद को पा सकता है। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है "
وعن عائشة رضي الله عنها قالت سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول " إن المؤمن ليدرك بحسن خلقه درجة الصائم والقائم " - أخرجه ابوداؤد والحاكم
इस हदीस का अर्थातः बेशक मूमीन अपने अच्छे आचरण और शुद्ध व्यवहार से हमेशा रोज़ा रखने वाले, हमेशा नमाज़ पढ़ने वाले के स्थान को पा सकता है।
इसी तरह क़ियामत के दिन तराज़ू में सब से भारी चीज़ अच्छा आचार उत्तम चरित्र ही होगा। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है "
وعن أبي الدرداء رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال " ما من شيئ أثقل في ميزان العبد المؤمن يوم القيامة من حسن الخلق وان الله يبغض الفاحش البذي " - أخرجه الترمذي
इस हदीस का अर्थातः अबू दरदा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है " मूमीन बन्दों के तराज़ू में क़ियामत के दिन सब से भारी चीज़ अच्छे अख्लाक होंगे और अल्लाह तआला बद खुलुक दुराचार तथा दुर्व्यवहार वाले से घृणा करते हैं।"
अल्लाह तआला भी उन लोगों से प्रेम करता है जो अच्छे चरित्र वाले होते हैं, और अल्लाह की ओर से मानव को सब से उत्तम चीज़ वर्दान की जाती है वह अच्छे व्यवहार , सुन्दर आचार और बेह्तरीन चरित्र है। जैसा कि हदीस में आया है।
قالوا : يا رسول الله ! ما خير ما اعطي الإنسان ؟ قال " الخلق الحسن " - صحّحه الألباني
लोगों ने प्रश्न किया. ऐ अल्लाह के रसूल! लोगों को सब से अच्छी चीज़ कौन सी वर्दान की जाती है तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उत्तर दिया। अच्छे व्यवहार "
जो लोग अच्छे चरित्र वाले होते हैं, स्वभाव को अपनी जीवन का अटूट हिस्सा बना लेते हैं, लोगों के प्रति उसका हृदय नरम होता है, अच्छे व्यवहार से मिलते जुलते हैं तो ऐसे लोगों के लिए जन्नत (स्वर्ग) की गारेन्टी मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने लिया है
وعن أبي أمامة الباهلي رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:" أنا زعيم ببيت في ربض الجنة لمن ترك المراء وإن كان محقا ، وببيت في وسط الجنة لمن ترك الكذب وإن كان مازحا ، وببيت في أعلى الجنة لمن حسن خلق " - الترغيب والترهيب للمنذري
इस हदीस का मत्लब यह है, अबु उमामा बाहली (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " मैं उस व्यक्ति के लिए जन्नत (स्वर्ग) के निच्ले हिस्से की जिम्मेदारी लेता हूँ जो हक्दार होने के बावजूद झग्ड़ा लड़ाइ छोड़ दे, और मैं उस व्यक्ति के लिए जन्नत (स्वर्ग) के बीचवाले हिस्से की जिम्मेदारी लेता हूँ जो हंसी-मज़ाक में भी झूट बोलना छोड़ दे, और मैं उस व्यक्ति के लिए जन्नत (स्वर्ग) के उच्च स्थान की जिम्मेदारी लेता हूँ जिसका चरित्र, व्यवहार, स्वभाव अच्छा होजाए,
सुब्हानल्लाह, कितना बड़ा स्थान और किया ही शुभ सूची है उन व्यक्तियों के लिए जो उत्तम व्यवहार, सुन्दर आचार , अच्छे अख्लाक़, और उम्दा चरित्र वाले होते हैं। यही कारण है कि संसारिक जीवन और पारलौकिक जीवन की सफलता केवल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आदर्शनीय जीवन के अनुसार जीवन बिताने पर निर्भर करता है। जीवन के हर मोड़ पर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अपना आदर्श माना जाए, क्यों कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अमल कर के कुरआन का व्याख्या किया है, अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के महामहानतम अख्लाक को बयान किया,
وإنّك لعلى خلق عظيم " - القلم : 4"
इस आयत का अर्थातः और बैशक आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अख्लाक़ के बड़े मरतबे पर हो,
प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अख्लाक़ के प्रति आईशा (रज़ी अल्लाह अन्हा) से प्रश्न किया गया तो आईशा (रज़ी अल्लाह अन्हा) ने उत्तर दिया कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का अख्लाक ही कुरआन था।
इतने उच्च आचार और उत्तम व्यवहार के मालिक होने के बावजूद आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह से प्रार्थना करते थे कि मेरे अख्लाक को उत्तम से उत्तम कर दे
عن عبدالله بن مسعود رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول: " اللهم أحسنت خلقي فأحسن خلقي " - مسند أحمد
इस हदीस का माना यह है, अबदुल्लाह बिन मस्ऊद (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह से हमेशा दुआ मांगते थे " ऐ अल्लाह ! जिस तरह तूने मेरी बनावट को अति सुन्दर बनाया है उसी तरह मेरे आचार , व्यवहार को अति सुन्दर कर दे,
अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में खुले शब्दों में मानव को आदेश दे दिया कि यदि तुम अल्लाह और अन्तिम दिन पर विश्वास और ईमान रखते हो तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अनुसार जीवन गुज़ारो, और इसी में तुम्हारी सफलता है। अल्लाह का कथन है।
لقد كان لكم في رسول الله أسوة حسنة لمن كان يرجو الله و اليوم الآخر وذكرالله كثيرا" -الأحزاب: 21"
वास्तव में तुम लोगों के लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अन्तिम दिन की आशा रखता है और अल्लाह को ज़्यादा याद रखता है।
प्रिय मित्रो, अच्छे आचार , सुन्दर स्वभाव केवल पढ़ने – लिखने की चीज़ नही और न ही कहानिया है जिसे केवल बयान किया जाए और ईच्छाए हैं जिस की कल्पना की जाए बल्कि यह अल्लाह पर विश्वास तथा ईमान से प्राप्त होता है , अल्लाह पर ईमान पेड़ है तो अच्छा अख्लाक़ उसका फल, यदि ईमान बिल्डिंग की नीव है तो अच्छे अख्लाक़ उसकी इमारत, जब भी अख्लाक, व्यवहार , आचार अच्छा होगा, ईमान ज़्यादा होगा और अख्लाक बिग्ड़ेगा , आचार अशुद्ध होगा तो ईमान कमज़ोर होगा,
इसी लिए एक मुस्लिम की परिभाषा यह की गइ है जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है ,
المسلم من سلم المسلمون من لسانه ويده " - أخرجه : الترمذي"
मुसलमान वह है जिस के हाथ तथा ज़ुबान के शड़यंत्र से दुसरे मुसलमान सुरक्षित रहे,
एक व्यक्ति उसी समय जन्नत का मुस्तहिक़ होगा जब उसका आचरण, व्यवहार, स्वभाव अतिसुन्दर हो और उस के पड़ोसी उस से प्रसन्न हो, यदि किसी व्यक्ति का व्यवहार तथा चरित्र सुन्दर न होगा, वह अपने पड़ोसियों को परीशान करता हो, उसके पड़ोसी उस से अप्रसन्न हो तो ऐसा व्यक्ति जहन्नम (नरक) में जाऐगा जैसा कि अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाह अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से एक व्यक्ति ने प्रश्न किया कि ऐ अल्लाह के रसूल ! फलाँ महिला बहुत नमाज़ पढ़ती, बहुत रोज़ा रखती और बहुत ज़्यादा दान करती परन्तु उस के पड़ोसी उस महिला से बहुत परीशान हैं। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " वह जहन्नम (नरक) में जाऐगी, तो फिर उस व्यक्ति ने प्रश्न किया कि ऐ अल्लाह के रसूल ! फलाँ महिला केवल फर्ज़ (अनिवार्य़) नमाज़ पढ़ती, केवल फर्ज़ (अनिवार्य़) रोज़ा रखती और केवल फर्ज़ (अनिवार्य़) दान देती परन्तु उस के पड़ोसी उस महिला से बहुत ज़्यादा प्रसन्न हैं। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " वह जन्नत में जाऐगी,
गोया कि अच्छे अखलाक़, स्वभाव तथा उत्तम आचार के कारण ही हम अपने पारलोकिक जीवन को सफलपूर्वक बना सकते हैं और दूर्व्यवहार, अशुद्ध आचार के कारण हम अपने पारलोकिक जीवन को नष्ठ कर सकते हैं। निर्णय तथा कर्म करना हमारे हाथ में है।
रविवार, 5 दिसंबर 2010
माहे मोहर्रम की वास्तविकता
सम्पूर्ण परशंसा अल्लाह के योग्य है और मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर अनगिनित दरूदु सलाम हो, अल्लाह तआला का अपने दासों पर बहुत बड़ा कृपा है कि उसने बन्दों के झोली को पुण्य से भरने के लिए विभिन्न समय , महीने तथा तरीके उतपन्न किये, उन में से एक मोहर्रम का महीना है ।
मोहर्रम के महीने की सर्वशेष्टा निम्नलिखित वाक्यों से प्रमाणित होता है।
माहे मोहर्रम में रक्तपात, किसी पर अत्याचार करने का पाप दुग्ना हो जाता है।
जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है। " वास्तविकता यह है कि महीनों की संख्या जब से अल्लाह ने आकाश और धरती की रचना की है, अल्लाह के लेख में बारह ही है और उन में से चार महीने आदर के (हराम) हैं। यही ठीक नियम है, अतः इन चार महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म (अत्याचार) न करो " ( सूरः तौबा , 36)
अबू बकरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने हज के भाषण में फरमाया " निःसंदेह समय चक्कर लगा कर अपनी असली हालत में लौट आया है जिस दिन अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की रचना किया। वर्ष में बारा महीने होते हैं। उन में से चार आदर के (हराम) महीने हैं। तीन महीने मुसलसल हैं, जूल कादा, जूल हिज्जा, मोहर्रम और रजब है।" ( सही बुखारी और सही मुस्लिम)
अबू ज़र (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रश्न किया कि रात का कौन सा भाग अच्छा है और कौन सा महीना सर्वशेष्टा है ? तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया। रात का अन्तिम भाग अच्छा है और मोहर्रम का महीना सर्वशेष्टा है।" ( सुनन नसई)
रमज़ान महीने बाद के मोहर्रम का महीना बेहतरीन है जैसा की एक हदीस से इस बात की पुष्ठी करण होता है। अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया " सब से अच्छा रोज़ा रमज़ान के बाद अल्लाह के महीने मोहर्रम का रोज़ा है और फर्ज़ नमाज़ के बाद सर्वशेष्ट नमाज़ रात की नमाज़ है।" ( सही मुस्लिम )
मोहर्रम के रोज़ा रखने का कारण
रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस मोहर्रम के रोज़ा रखने का कारण भी बता दिया है। जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब मदीना हिज्रत कर के तशरीफ लाए तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पाया कि यहूद रोज़ा रखते हैं। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने प्रश्न किया, तुम लोग किस कारण आशूरा (10 मोहर्रम) के दिन रोज़ा रखते हो ? तो उन लोगों ने उत्तर दिया, यह एक महान दिन है जिस में अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्साम) और उन की समुदाय को फिरऔन से मुक्ति दी और फिरऔन और उस की समुदाय को डुबा दिया। तो मूसा (अलैहिस्साम) ने अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए रोज़ा रखा। तो हम लोग भी इसी दिन रोज़ा रखते हैं। तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा " हम तुम लोगों से अधिक मूसा (अलैहिस्साम) के निकटतम और हक्दार हैं और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रोज़ा रखा और इस रोज़े के रखने का आदेश दिया।" ( सही बुखारी और सही मुस्लिम)
मोहर्रम के रोज़े की फज़ीलत
मोहर्रम के 10 वे दिन की एहमीयत बहुत ज़्यादा है और मूसा (अलैहिस्साम) ने रोज़ा रखा और उन के अनुयायियों ने भी रोज़ा रखा यहाँतक कि कुरैश (इस्लाम से पहले के अरब वासी) ने रोज़ा रखा और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रोज़ा रखा और लोगों को इस रोज़े के रखने पर उत्साहित किया। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन है जिसे अबू क़ताता (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि एक व्यक्ति ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से आशूरा के रोज़े के प्रति प्रश्न क्या ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया।" मैं अल्लाह से आशा करता हूँ कि एक वर्ष के पापों के मिटा देगा " ( सही मुस्लिम)
यह अल्लाह तआला का बहुत बड़ा कृपा हम पर है कि एक दिन के रोज़े के बदले एक वर्ष के पाप स्माप्त हो जाते हैं। प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 10 मोहर्रम के रोज़े का खास ध्यान रखते थे। जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को आशूरा के दिन का रोज़ा रखने का बहुत ख्याल करते हुए पाया और रमज़ान के रोज़े का ऐहतमाम करते हुए देखा । ( सही बुखारी)
आशूरा का रोज़ा किस किस तिथि को रखा जाए ?
(1) मोहर्रम की 9 और 10 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " यदि मैं आने वाले वर्ष तक जीवित रहा तो 9 और 10 का रोज़ा रखूंगा " ( सही मुस्लिम)
(2) मोहर्रम की 10 और 11 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " यहूद की मुखाल्फत करो, 10 के साथ एक दिन पहले ( 9 तिथि) या एक दिन बाद (11) को रोज़ा रखो, ( मुस्नद अहमद और इब्ने खुज़ैमा )
(3) मोहर्रम की 9 , 10 और 11 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " 10 के साथ एक दिन पहले ( 9 तिथि) और एक दिन बाद (11) को रोज़ा रखो,
मोहर्रम के महीने की सर्वशेष्टा निम्नलिखित वाक्यों से प्रमाणित होता है।
माहे मोहर्रम में रक्तपात, किसी पर अत्याचार करने का पाप दुग्ना हो जाता है।
जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है। " वास्तविकता यह है कि महीनों की संख्या जब से अल्लाह ने आकाश और धरती की रचना की है, अल्लाह के लेख में बारह ही है और उन में से चार महीने आदर के (हराम) हैं। यही ठीक नियम है, अतः इन चार महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म (अत्याचार) न करो " ( सूरः तौबा , 36)
अबू बकरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने हज के भाषण में फरमाया " निःसंदेह समय चक्कर लगा कर अपनी असली हालत में लौट आया है जिस दिन अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की रचना किया। वर्ष में बारा महीने होते हैं। उन में से चार आदर के (हराम) महीने हैं। तीन महीने मुसलसल हैं, जूल कादा, जूल हिज्जा, मोहर्रम और रजब है।" ( सही बुखारी और सही मुस्लिम)
अबू ज़र (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रश्न किया कि रात का कौन सा भाग अच्छा है और कौन सा महीना सर्वशेष्टा है ? तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया। रात का अन्तिम भाग अच्छा है और मोहर्रम का महीना सर्वशेष्टा है।" ( सुनन नसई)
रमज़ान महीने बाद के मोहर्रम का महीना बेहतरीन है जैसा की एक हदीस से इस बात की पुष्ठी करण होता है। अबू हुरैरा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया " सब से अच्छा रोज़ा रमज़ान के बाद अल्लाह के महीने मोहर्रम का रोज़ा है और फर्ज़ नमाज़ के बाद सर्वशेष्ट नमाज़ रात की नमाज़ है।" ( सही मुस्लिम )
मोहर्रम के रोज़ा रखने का कारण
रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस मोहर्रम के रोज़ा रखने का कारण भी बता दिया है। जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब मदीना हिज्रत कर के तशरीफ लाए तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पाया कि यहूद रोज़ा रखते हैं। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने प्रश्न किया, तुम लोग किस कारण आशूरा (10 मोहर्रम) के दिन रोज़ा रखते हो ? तो उन लोगों ने उत्तर दिया, यह एक महान दिन है जिस में अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्साम) और उन की समुदाय को फिरऔन से मुक्ति दी और फिरऔन और उस की समुदाय को डुबा दिया। तो मूसा (अलैहिस्साम) ने अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए रोज़ा रखा। तो हम लोग भी इसी दिन रोज़ा रखते हैं। तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा " हम तुम लोगों से अधिक मूसा (अलैहिस्साम) के निकटतम और हक्दार हैं और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रोज़ा रखा और इस रोज़े के रखने का आदेश दिया।" ( सही बुखारी और सही मुस्लिम)
मोहर्रम के रोज़े की फज़ीलत
मोहर्रम के 10 वे दिन की एहमीयत बहुत ज़्यादा है और मूसा (अलैहिस्साम) ने रोज़ा रखा और उन के अनुयायियों ने भी रोज़ा रखा यहाँतक कि कुरैश (इस्लाम से पहले के अरब वासी) ने रोज़ा रखा और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रोज़ा रखा और लोगों को इस रोज़े के रखने पर उत्साहित किया। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन है जिसे अबू क़ताता (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि एक व्यक्ति ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से आशूरा के रोज़े के प्रति प्रश्न क्या ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया।" मैं अल्लाह से आशा करता हूँ कि एक वर्ष के पापों के मिटा देगा " ( सही मुस्लिम)
यह अल्लाह तआला का बहुत बड़ा कृपा हम पर है कि एक दिन के रोज़े के बदले एक वर्ष के पाप स्माप्त हो जाते हैं। प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 10 मोहर्रम के रोज़े का खास ध्यान रखते थे। जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को आशूरा के दिन का रोज़ा रखने का बहुत ख्याल करते हुए पाया और रमज़ान के रोज़े का ऐहतमाम करते हुए देखा । ( सही बुखारी)
आशूरा का रोज़ा किस किस तिथि को रखा जाए ?
(1) मोहर्रम की 9 और 10 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " यदि मैं आने वाले वर्ष तक जीवित रहा तो 9 और 10 का रोज़ा रखूंगा " ( सही मुस्लिम)
(2) मोहर्रम की 10 और 11 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " यहूद की मुखाल्फत करो, 10 के साथ एक दिन पहले ( 9 तिथि) या एक दिन बाद (11) को रोज़ा रखो, ( मुस्नद अहमद और इब्ने खुज़ैमा )
(3) मोहर्रम की 9 , 10 और 11 तिथि को रोज़ा रखा जाए, जैसा कि इब्ने अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आशूरा के दिन का रोज़े बारे में फरमाया " 10 के साथ एक दिन पहले ( 9 तिथि) और एक दिन बाद (11) को रोज़ा रखो,
बुधवार, 1 सितंबर 2010
शबे क़द्र

रमज़ान महीने में एक रात ऐसी भी आती है जो हज़ार महीने की रात से बेहतर है जिसे शबे क़द्र कहा जाता है। शबे क़द्र का अर्थ होता है " सर्वशेष्ट रात " ऊंचे स्थान वाली रात " लोगों के नसीब लिखी जानी वाली रात,
शबे क़द्र बहुत ही महत्वपूर्ण रात है जिस के एक रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादतों से बेहतर और अच्छा है। इसी लिए इस रात की फज़ीलत कुरआन मजीद और प्रिय रसूल मोहम्मद( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीसों से प्रमाणित है।
निम्नलिखित महत्वपूर्ण वाक्यों से क़द्र वाली रात की अहमियत मालूम होती है।
(1) इस पवित्र रात में अल्लाह तआला ने कुरआन करीम को लोह़ महफूज़ से आकाश दुनिया पर उतारा फिर 23 वर्ष की अविधि में अवयशक्ता के अनुसार मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर उतारा गया। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " हम्ने इस (कुरआन) को कद्र वाली रात में अवतरित किया है।.. " (सुराः कद्र)
(2) यह रात अल्लाह तआला के पास बहुत उच्च स्थान रखता है।
इसी लिए अल्लाह तआला ने प्रश्न के तरीके से इस रात की महत्वपूर्णता बयान फरमाया है और फिर अल्लाह तआला स्वयं ही इस रात की फज़ीलत को बयान फरमाया कि यह एक रात हज़ार महीनों की रात से उत्तम है। " और तुम किया जानो कि कद्र की रात क्या है ? क़द्र की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है।" (सुराः कद्र)
(3) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से अन्गीनित फरिश्ते और जिबरील आकाश से उतरते है। अल्लाह तआला की रहमतें, अल्लाह की क्षमा ले कर उतरते हैं, इस से भी इस रात की महत्वपूर्णता मालूम होती है। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " फ़रिश्ते और रूह उस में अपने रब की अनुज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं। " (सुराः कद्र)
(4) यह रात बहुत सलामती वाली है। इस रात में अल्लाह की इबादत में ग्रस्त व्यक्ति परेशानियों, ईश्वरीय संकट से सुरक्षित रहते हैं। इस रात की महत्वपूर्ण, विशेष्ता के बारे में अल्लह तआला ने कुरआन करीम में बयान फरमाया है। " यह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। " (सुराः कद्र)
(5) यह रात बहुत ही पवित्र तथा बरकत वाली है, इस लिए इस रात में अल्लाह की इबादत की जाए, ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह से दुआ की जाए, अल्लाह का फरमान है। " हम्ने इस (कुरआन) को बरकत वाली रात में अवतरित किया है।...... " (सुराः अद् दुखान)
(6) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से लोगों के नसीबों (भाग्य) को एक वर्ष के लिए दोबारा लिखा जाता है। इस वर्ष किन लोगों को अल्लाह तआला की रहमतें मिलेंगी? यह वर्ष अल्लाह की क्षमा का लाभ कौन लोग उठाएंगे? इस वर्ष कौन लोग अभागी होंगे? किस को इस वर्ष संतान जन्म लेगा और किस की मृत्यु होगी? तो जो व्यक्ति इस रात को इबादतों में बिताएगा, अल्लाह से दुआ और प्राथनाओं में गुज़ारेगा, बेशक उस के लिए यह रात बहुत महत्वपूर्ण होगी। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " यह वह रात है जिस में हर मामले का तत्तवदर्शितायुक्त निर्णय हमारे आदेश से प्रचलित किया जाता है। " (सुराः अद् दुखानः5 )
(7) यह रात पापों , गुनाहों, गलतियों से मुक्ति और छुटकारे की रात है।
मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। खास कर इस रात में लम्बी लम्बी नमाज़े पढ़ा जाए, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों, गलतियों पर माफी मांगा जाए, अल्लाह तआला बहुत माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है। " जो व्यक्ति शबे क़द्र में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे" ( बुखारी तथा मुस्लिम)
यह महान क़द्र की रात कौन सी है ?
यह एक ईश्वरीय प्रदान रात है जिस की महानता के बारे में कुछ बातें बयान की जा चुकी हैं। इसी शबे क़द्र को तलाशने का आदेश प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने कथन से दिया है। " जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि " रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक रातों में तलाशों " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
एक हदीस में रमज़ान करीम की चौबीसवीं रात में शबे क़द्र को तलाशने का आज्ञा दिया गया है। और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस मुबारक रात की कुछ निशानियाँ बताया है। जिस के अनुसार वह रात एकीस रमज़ान की रात थीं जैसा कि प्रिय रसूल के साथी अबू सईद अल खुद्री (रज़ी अल्लाहु अन्हु) वर्णन करते हैं। प्रिय रसूल के दुसरे साथी अब्दुल्लाह बिन अनीस (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात तेईस रमज़ान की रात थीं और अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) तथा उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात सत्ताईस रमज़ान की रात थीं और उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) तो कसम खाया करते थे कि शबे क़द्र सत्ताईस रमज़ान की रात है, तो उन के शागिर्द ने प्रश्न किया कि किस कारण इसी रात को कहते हैं? तो उन्हों ने उत्तर दिया, निशानियों के कारण, प्रिय रसूल मोहम्मद (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने भी शबे क़द्र को अन्तिम दस ताक वाली(21,23,25,27,29) रातों में तलाश ने का आदेश दिया है। शबे क़द्र के बारे में जितनी भी हदीस की रिवायतें आइ हैं। सब सही बुखारी, सही मुस्लिम और सही सनद से वारिद हैं। इस लिए हदीस के विद्ववानों ने कहा है कि सब हदीसों को पढ़ने के बाद मालूम होता है कि शबे क़द्र हर वर्ष विभिन्न रातों में आती हैं। कभी 21 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 23 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 25 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 27 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 29 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती और यही बात सही मालूम होता है। इस लिए हम इन पाँच बेजोड़ वाली रातों में शबे क़द्र को तलाशें और बेशुमार अज्रो सवाब के ह़क़्दार बन जाए।
शबे क़द्र की निशानीः
प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस रात की कुछ निशानी बयान फरमाया है जिस के माध्यम से इस महत्वपूर्ण रात को पहचाना जा सकता है।
(1) यह रात बहूत रोशनी वाली होगी, आकाश प्रकाशित होगा , इस रात में न तो बहुत गरमी होगी और न ही सर्दी होगी बल्कि वातावरण अच्छा होगा, उचित होगा। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने निशानी बताया है जिसे सहाबी वासिला बिन अस्क़अ वर्णन करते है कि रसूल ने फरमाया " शबे क़द्र रोशनी वाली रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और वातावरण संतुलित होता है और सितारे को शैतान के पीछे नही भेजा जाता।" ( तब्रानी )
(2) यह रात बहुत संतुलित वाली रात होगी। वातावरण बहुत अच्छा होगा, न ही गर्मी और न ही ठंडी होगी। हदीस रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इसी बात को स्पष्ट करती है " शबे क़द्र वातावरण संतुलित रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो लालपन धिमा होता है।" ( सही- इब्नि खुज़ेमा तथा मुस्नद त़यालसी )
(3) शबे क़द्र के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी धिमी होती है, सुर्य के रोशनी में किरण न होता है । जैसा कि उबइ बिन कअब वर्णन करते हैं कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी में किरण न होता है।" ( सही मुस्लिम )
हक़ीक़त तो यह है कि इन्सान इन रातों की निशानियों का परिचय कर पाए या न कर पाए बस वह अल्लाह की इबादतों, ज़िक्रो- अज़्कार, दुआ और कुरआन की तिलावत,कुरआन पर गम्भीरता से विचार किरे । इख्लास के साथ, केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए अच्छे तरीक़े से अल्लाह की इबादत करे, प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इताअत करे, और अपनी क्षमता के अनुसार अल्लाह की खूब इबादत करे और शबे क़द्र में यह दुआ अधिक से अधिक करे, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों , गलतियों पर माफी मांगे जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि, मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न क्या कि यदि मैं क़द्र की रात को पालूँ तो क्या दुआ करू तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " अल्लाहुम्मा इन्नक अफुव्वुन करीमुन, तू हिब्बुल-अफ्व,फअफु अन्नी" अर्थात: ऐ अल्लाह ! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तो मेरे गुनाहों को माफ कर दे।"
अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे। आमीन............
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